CTET UPTET 2018 Chhand Verse Study Material in Hindi

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छन्द (Verse)

रचनाओं की वह प्रवृत्ति जिसमें वर्ण, मात्रा, यति, गति, तुक आदि पर बल दिया जाता है, वे छन्द कहलाते हैं।

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आचार्य पिंगल को छन्दशास्त्र का आदि आचार्य माना जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ छन्दसूत्र में छन्द का विस्तृत वर्णन किया है। इनके नाम पर ‘छन्दशास्त्र’ को पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है।

छन्द के अंग

1.वर्ण वर्ण ही अक्षर कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं

  1. हृस्व जिन वर्णों के उच्चारण में थोड़ा समय लगे, वे हृस्व वर्ण कहलाते हैं; जैसे – अ, इ, उ, ऋ।

इसकी एक मात्रा मानी जाती है। इन्हें लघु की संज्ञा भी दी गई है, इनका चिन्ह् ‘।’ है।

      2. दीर्घ जिन वर्णों के उच्चारण में हृस्व वर्ण से दोगुना समय लगे, उन्हें दीर्घ वर्ण कहा जाता है; जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

इसकी दो मात्राएँ मानी जाती हैं। इन्हें गुरु की संज्ञा भी दी गई है इसका चिन्ह् ‘.’ है।

2. मात्रा किसी स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, वह मात्रा कहलाती है। छन्दशास्त्र में मात्रा की कई संज्ञाएँ दी गई हैं; जैसे –  माता, मत, कला, कल।

3. यति छन्दों को पढ़ते समय कई स्थानों पर विराम लेना पड़ता है। उन्हीं विराम स्थलों को ‘यति’ कहते हैं।

4. गति छन्दों को पढ़ते समय एक प्रकार के प्रवाह (धारा) की अनुभूति होती है, जिसे गति कहते हैं।

5. तुक छन्दों के पदान्त में जो अक्षरों की समानता पायी जाती है, उन्हें तुक कहते हैं।

तुक दो प्रकार के होते हैं-

(i) तुकान्त तथा (ii) अतुकान्त।

तुक वाले छन्द तुकान्त व तुक-हीन छन्दों को अतुकान्त कहते हैं।

6. लघु और गुरु छन्दशास्त्र में हृस्व को लघु और दीर्घ को गुरु कहते हैं। गुरु का चिन्हृ ‘.’ है। लघु का चिन्हृ ‘।’ है।

गण तीन वर्णों के लघु-गुरु क्रम के अनुसार योग को गण कहते हैं। गणों की संख्या आठ होती है। ये हैं – यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण।

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मात्रिक छन्द के चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण को पाद और पद भी कहते हैं। प्रथम और तृतीय विषम चरण होते हैं। द्वीतीय तथा चतुर्थ चरण ‘सम’ कहलाते हैं।

मात्राओं को हृस्व और दीर्घ वर्ण के अनुसार क्रमश: लघु और गुरु कहते हैं। लघु का चिन्हृ (।) तथा गुरु का चिन्हृ (s) होता है।

उदाहरण – सुमिरत सोइ (।।।।s।) में 7 मात्राएँ हैं।

छन्द : एक नजर में

नामप्रत्येक चरण में मात्राएँउदाहरण
मात्रिक छन्द
चौपाई16व्याकुल राउ सिथिल सब गाता,

करनि कल्पतरु मनहुँ निपाता।

रोला24तब नृप करि आचमन,

तब नृप करि आचमन,

मारजन सुचि रुचिकारी।

दोहा13/11मन ऊँचो रवि ऊँच हैं, करतब नीचे बनाय।
सोरठा11/13हौं गुरु सदा अबोध, बोध राशि आरत हरण।
बरवै12/7अवधि शिला का उस पर, था गुरुभार।
उल्लाला15/13हे शरणदायिनी देवि। तू करती सबका त्राज है।
दिग्पाल24सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा।
लावनी30शोक भरे बन्दों में मुझसे कहो न जीवन सपना है।
हरिगीतिका28कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
वर्णिक छन्दप्रत्येक चरण में वर्णों की संख्याउदाहरण
इन्द्रवज्रा11ऊँचे उठो दिव्य कला दिखाओ,

संसार में पूज्य पुन: कहलाओ।

उपेन्द्रवज्रा11बिना विचारे यदि काम होगा।

कभी न अच्छा परिणाम होगा।

मन्दाक्रान्ता17प्यारे तेरा गम सुन के दूसरे रो रहे हैं;
मालती23हो रहते तुम नाथ जहाँ बहता मन साथ सदैव वहाँ पर।
मालिनी 15प्रिय पति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है? दुख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है?
तोटक12निज गौरव का नित ज्ञान रहे।

हम भी कुछ हैं, यह ध्यान रहे।

सवैया22/26केशव ये मिथिलाधिप हैं जग में जिन कीरति बेलि लई है।

दान कृपान विधानन सों सिगरी बसुधा जिन हाथ लई हैं।

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