CTET UPTET Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi

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बुद्धि निर्माण एवं बहुआयामी बुद्धि बुद्धि(Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
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:- Intelligence शब्द का प्रयोग सामान्यत: प्रज्ञा, प्रतिभा, ज्ञान एवं समझ इत्यादि कई अर्थो में किया जाता है | यह वह शक्ति है जो हमे समस्याओ का समाधान करने एवं उद्देश्यों को प्राप्त करने में सक्षम बनाती है | एल. एम. टर्मन ने बुद्धि की परिभाषा इस प्रकार दी है-बुद्धि अमूर्त विचारो के सन्दर्भ में सोचने की योग्यता है | स्टर्न :- के अनुसार बुद्धि व्यक्ति की वह सामान्य योग्यता है जिसके द्वारा वह सचेत रूप से नवीन आवश्यकताओ के अनुसार चिन्तन करता है | इस तरह, जीवन की नई समस्याओ एवं स्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालने की सामान्य मानसिक योग्यता ‘बुद्धि’ कहलाती है | यधापी बुद्धि के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिक में मतभेद है, फिर भी यह निश्चित तौर पर कहा जाता है की यह किसी के व्यक्तित्व का मुख्य निर्धारक है, क्योकि इससे व्यक्ति की योग्यता का पता चलता है | इसे व्यक्ति की जन्मजात शक्ति कहा जाता है, जिसके उचित विकास में उसके परिवेश की भूमिका प्रमुख होती है | मानव विकास की विभिन्न अवस्थाओ में वृद्धि के विकास में अन्तर होता है
विभिन्न मनोवैज्ञानिको द्वार दिए गए बुद्धि की परिभाषाओं से इसके स्वरुप का पता चलता है
जीवन की अपेक्षाकृत नवीन परिस्थितियोंसे अपना3 सामंजस्य करने की व्यक्ति की योग्यता ही बुद्धि है। बुद्धि बह शक्ति है, जो हमको समस्याओंका समाधान करने और उददेश्यों को पिराप्त करने की क्षमता देती है। रायबर्न
बुद्धि ज्ञान तत्व होते है –ज्ञान की क्षमता एवं निहित ज्ञान हेनमॉन
बुद्धि ज्ञान का अर्जन करने की क्षमता है। वुडरो
स्तय या तथ्य के दृष्टिकोण से उत्तम प्रतिक्रियाओं की शक्ति की बुद्धि है थॉर्नडाइक
यदि व्यक्ति ने अपने वातावरण से सामंजस्य करना सीख लिया है या सीख सकता है तो उसमे बुद्धि है कॉलविन
उपरोक्त परिभाषाओं के अनुसार हम कह सकते है कि बुद्धि अनूर्त चिन्तन चकी योग्यता, अनुभव से लाभ उठाने की योग्यता, अपने वातावरण से सामंजस्य करने की योग्यता, सीखने की योग्य़ता समस्य़ा समाधान करने की योग्यता तथा सम्बन्धों को समझने की योग्यता है।
बुद्धि के सिद्धान्त (Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
कुछ मनोवैज्ञानिको ने बुद्धि के स्वसुप से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किय4 है, जिनसे बुद्धि के सम्वन्ध मे कई प्राकर की महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती है। बुद्धि के प्रमुख सिद्धान्तों का विवरण नीचो दिया गया है
एक –कारक सिद्धान्त एक कारक सिद्धान्त का प्रतिपादन बिने ने किया और इस सिद्धान्त का समर्थन कर इसको आगे बढाने का श्रेय टर्मन और स्टर्न जैसे मनोवैज्ञानिकों को है। स्पष्ट है कि इस सिद्धान के अनुसार बुद्धि को एक शक्ति या कारक के रुप में माना गया है। इन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बुद्धि , वह मानसिक शक्ति है, जो व्यक्ति के समस्त मानसिक कार्यो का संचालन करती है तथा व्यक्ति के समस्त व्यवहारो का प्रभावित करती है।
व्दि-कारक सिद्धान्त इस सिद्धान्त के प्रतिपादन स्पीयरमैन है। उनके अनुसार बुद्धि मे दो कारक है अथाव सभी प्रकार के मानसिक कार्यो में दो प्रकार की मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता होती है – प्रथम सामन्य मानसिक योग्यता , दितीय विशिष्ट मानसिक योग्यता। प्रत्येक व्यक्ति में सामान्य, मानसिक योग्यता के अतिरिक्त कुछ- न कुछ विशिष्ट योग्यताएँ भी पाई जाती है। एक व्यक्त जितने ही क्षेत्रों अथावा विषयों मे कुशल होता है, उसिमें उतनी ही विशिष्ट योग्यताएँ पाई जाती हैं। यदि एक व्यक्ति में एक से अतधिक विशिष्ट योग्यताएँ है तो इन विशिष्ट योग्यताओं में कोई विशेष सम्बन्ध नही पाया जात स्पीयरमैन का यह विचार है कि एक व्यत्कि में सामान्य योग्यता की मात्रा जितनी ही अधिक पाई जाती है, वह उतना ही अधिक बुद्धिमान होता हैं।
बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र (Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
बहुकारक सिद्धान्त इस सिद्धान्त के नुख्य समर्थक थॉर्नडाइक थे। इस सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि कई तत्वों का समूह होती है और प्रत्येक तत्व में कोई सूक्ष्मम योग्यता निहित होती है। अत: सामान्य बुद्धि नान की कोई चीज नही होती , बल्कि बुद्धि में कोई स्वतन्त्र, विशिष्ट योग्यताएँ निहित रहती हैजो विभिन्न कार्यो को सम्पादित करती है।
प्रतिदर्श सिद्धान्त इस सिद्धान्त का प्रतिपादन थामसन ने किया था। उसने अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन स्पीयरमैन के व्दि-कारक सिद्धान्त का प्रतिपादन स्पीयरमै के व्दि- कारक सिद्धान्त के विरोध में किया था । थॉमसन ने इस बात का तर्क दिया कि व्यक्ति का बौद्धिक व्यवहार अनेक स्वतन्त्र योग्यताओं पर निर्भर करता है, किन्तु इन स्वतन्त्र योग्यताओं का क्षेत्र सीमित होता है। प्रतिदर्श सिद्धान्त के अनुसार बुद्धि कई स्वतन्त्र तत्वों से बनी होती है। कोई विशिष्ट परीक्षण या विद्दालय सम्बन्धी क्रिया में इनमें से कुछ तत्व स्पष्ट रुप से दिखाई देने लगते है यह भी हो सकता है कि दो या अधिक परीक्षाओं में एक ही प्रकार के तत्व दिखाई दे तदब उनमें कोई भी तत्व सामान्य नही होगा3 और प्रत्येक तत्व अपने आप में विशिष्ट होगा।
समूह- तत्व सिद्धान्त जो तत्व सभी प्रतिभात्मक योग्यताओं में तो सामान्य नहीं होते परन्तु कई क्रियाओं में सामान्य होते है, उन्हे समूह – तत्व की संज्ञा दी गई है। स सिद्धान्त के समर्थको में थर्स्टन का नाम प्रमुख है। प्रारम्भिक मानसिक योग्यताओं का परीक्षाण करते हुए बह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थ कि कुछ मानसिक क्रियाओं को मनोवैज्ञानिक एवं विद्दमान होता है जो उन क्रियोंओ को मनोवैज्ञानिक एवं क्रियात्मक एकता प्रदान करता है और उन्हें अन्य मानसिक क्रियाओं से अलग करता है। मानसिक क्रियाओं के कई समूह तत्व सिद्धान्त की सबसे बडी कमजोरी यह है कि यह सामान्य तत्व की घ3रणा का खण्डन करता है।
गिलफोर्ड का सिद्धान्त जे.पी. गिलफोर्ड और उसके सहयोगियों ने बुद्धि परीक्षण से सम्बन्धित कई परीक्षणों पर कारक विश्लेषण तकनीक का प्रयोग करते हुए मानव बुद्धि के विभिन्न तत्वों या कारको को प्राकश में लाने वाला प्रतिमान विकसित किया । उन्होने उपने ध्ययन प्रयासों के दवारा यह प्रतिपादित करने की चेष्टा की कि हमारी किसी भी मानसिक प्रक्रिया अथवा बौद्धिक कार्य को तीन आधारभूत आयमों संक्रिया सूचना सामग्री या विषरय वस्तु तथा उत्पाद में विभाजित किया जा सकतै है। संक्रिया का4 अर्थ यहाँ हमारी उस मानसिक चेष्टा, तत्परता और कारयशीलता से होता है रजिसकी मदद से हम किसी भी सूचा सामगिरी या विषय वस्तु को अपने चिन्तन तथा मनन का विषय बनाते है या दुसरे शब्दों में इसे चिन्तन तथा मनन का विषय बनाते है या दूसरे शब्दो में इसे चिन्ता तथा मनन का प्रयोग करते हुए अपनू बुद्धि को काम में लाने का प्रयास कहा जा सकता है
फ्लूइड तथा क्रिस्टलाइज्ड सिद्धान्त
इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कैटिल है। फ्लूइड वंशानक्रम कार्य कुशलता (Genetic potentiality) अथावा केन्दीय नाडी संसथान की दी हुई विशेषचा पर आधारित एक सामान्य योग्यता है। यह सामान्य योग्यता संस्कृति से ही प्रभावित नहीं होती है दूसरी और क्रिस्टलाईज्ड भी एक प्रार की सामान्य योग्यता है जो अनुभव अधिगम तथा बातावरण सम्बन्धी कारकों पर आधारित होती है।
बहुआयामी बुद्धि(Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
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केली एवं थर्सटन नामक मनोवैज्ञानिकों ने बताय कि बुद्धि का निर्माण प्राथमिक मानसिक योग्यतओं के द्वार होता है केली के अनुसार, बुद्धि का निरमाण इन योग्यताओ से होता है – वाचिक योग्यता, गामक योग्यता, सांख्यिक योग्यता यान्त्रिक योगय्ता सामाजिक योग्यता संगीतात्क योग्यता स्थानिक सम्बन्धों के साथ उचित ढंग से व्यवहार करने की योग्यता रुचि और शारीरिक योग्यता। थर्सटन का मत है कि बुद्धि इन प्राथमिक मानसिक योग्यताओं का समूह होता है- प्रत्यक्षीकरण सम्बन्धी योग्यता, तार्किक व वाचिक योग्यता , समाधान की योग्यता, स्मृति सम्बन्धी योग्यता, आगमनात्मक योग्यता और निगमानात्मक योग्यता। वैसे तो अधिकतर आलोचना की, किन्तु अधिकरतर मनोवैज्ञानिकों ने यह भी माना कि बुद्धि का बहाआयमी होना निश्चित तौर पर सम्भव है। बहुआयमी बुद्धि होने के कारण ही कुछ लोग कई प्राकर के कौशलों में निपुण होते है।
मानसिक आयु और बुद्धि लब्धि(Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
स्टैनफोर्ड- बिने के परीक्षणों में पीक्षण द्वारा बुद्धि की गणना करने की विधि I. Q विधि थी, यदि बच्चा अपने से कम आयु वाले बच्चों की परीक्षा ही पास कर पाता तो उसकी बुद्धि कम समझी जाती थी और यदि बह अपनी आयु के लिए निर्धारित परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता था तो उसकी बुद्धि सामान्य समझी जाती थी इसी प्रकार से जब बह अपनी आयु से अधिक आयु के बच्चों के लिए निर्धारित परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता था तो उसकी बुद्धि श्रेष्ट समझी जाती थी यदि कोई बच्चा 5 वर्ष क लिए निर्धारित परीक्षण को कर लेता था तो उसकी मानसिक आयु 5 वर्ष समझी जाती थी। भले ही उस बच्चे की वास्तविक आयु 5 वर्ष हो, अधिक हो या कम हो। इसी प्रका यदि कोई बालक 8 वर्ष का है लेकिन वह 9 वर्ष के बालको के लिए निर्धारित परीक्षा को उत्तीर्ण कर लेतै है तो उसकी मानसिक आयु 9 वर्ष समझी जाती थी और एक 10 वर्ष का बालक 8 वर्ष के बालक की निर्धारित परीक्षा को ही उर्त्तीण कर पाता था तो उसकी मानसिक आयु केवल 8 वर्ष ही समझी जाती थी। उपर्यक्त विवरम के आधार पर कहा जा सकता है कि मानसिक आयु व्यक्ति के द्वारा प्राप्त विकास की सीमा की वह अभिव्यक्ति है जिसका कथन एक आयु – विशेष में प्रत्याशित उसके कार्य निष्पादन के रुप में किया जाता है। मानसिक आयु की सहायता से बालक की अथवा व्यक्त की मानसिक आयु जितनी अधिक होती , बह समझा जाता है कि उसकी विभिन्न मानसिक योग्यताओं का विकास उतना ही अधिक हुओ है या परिपक्व है। स्टर्न ने सर्वप्रथम बुद्धि लब्धि शब्द को प्रयुक्त किया। स्टर्न का इस शब्द से अभिप्राय शारीरिक आयु के अनुसार किए गए परीक्षणों में मानसिक योग्यता का परिचय प्राप्त करना था। टरमन ने सर्वप्रथम बुद्धि के फलांकन की विधि यह बताई कि बुद्धि का फलांकन I.Q. की गणना द्वारा करना चाहिए। I.Q. की गणना मानसिक आयु में शारीरिक आयुसे भाग देने तथा प्राप्त संख्या में 100 से गुणा करके जो मान पाप्त होता है, बह I.Q कहलाता है। उदाहरण के लिए, यदि एक बालक की मानसिक आयु 12 और वास्तविक आयु 10 वर्ष है तो उसकी I.Q. की गणना निम्न प्रकार से करेगें
I.Q. = MA/CA*100 =12/10*100=120
जबकि I.Q = Intelligence quotient (बुद्धि- लब्धि)
M.A = Mental Age (मानसिक आयु)
C.A. = Chronological Age (वास्तविक आयु)
टरमन ने बुद्धि के स्कोरिंग की विधि को विकसित करने के साथ –साथ उसने I. Q . के वितरण को भी ज्ञात किया। यहाँ नीचे स्टेनफोर्ड- बिने परीक्षण पर मैरिल (1938) तथा वैश्लर (1955) एडल्ट इण्टेलीजेन्स टेस्ट के I. Q. का वितरण निचे दिया हुआ है
I.Q वितरण वेश्लर के अनुसार I.Q. वितरण मोरिल के अनुसार
| I.Q. | Description | I.Q. | Description |
| 130 or Above
120- 139 110- 119 80-89
70-79 Below 70
| अति श्रेष्ठ बुद्धि आर्थात् प्रतिभाशाली बुद्धि श्रेष्ठ बुद्धि उच्च सामान्य बुद्धि सामान्य बुद्धि मन्द बुद्धि क्षीण बुद्धि निश्चित क्षीण बुद्धि | 140 and Above
120-139 110-119 80-89 70-79 Below 70
| अति श्रेष्ट बुद्धि अर्थात प्रतिभाशाली बुद्धि श्रेष्ट बुद्धि उच्च सामान्य बुद्धि सामान्य बुद्धि मन्द बुद्धि
क्षीण बुद्धि निश्चित क्षीण बुद्धि |
बौद्धिक विवृद्धि और विकास(Construct Intelligence Multi Dimensional Intelligence Study Material in Hindi)
बौद्धिक विवृद्धि और विकास अनेक कारकों पर निर्भार करता है। मास्तिष्क और सम्बन्धित स्नायुओं की परिपक्वता बौद्धिक विवृद्धि को सर्वाधिक प्रभावित करती है। जन्म के समय बालक में उसकी बौद्धिक योग्यतएँ अपने विकास की प्रथमावस्था के निम्नतम स्तर पर होती है। बालक की आयु बढने के साथ साथ उसकी बौद्धिक योग्यताओ में विवृद्धि और विकास होती हहता है। बचपनावस्था से उत्तर बाल्यावस्था के अन्त से और प्रौढावस्था में इस विकास की गति मंद हो जाती है।
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थर्स्टन का विचार है कि उसके द्वार किए गए कारक विश्लेषण अध्ययनों के आधार पर प्राप्त सात प्राथमिक मानसिक योग्यताएँ एक साथ क समान आयु स्तर पर परिपक्व नही होती है। इसी प्र्कार चौहह व्ष की अवस्था में वस्तु प्रेक्षक तथा तार्किक योग्यता सोलह वर्ष की आयु में स्मृति योग्यता और संख्यात्मक योग्यता परिपक्वावस्था की और अग्रसर होती है। बालकों की शाब्दिक योग्यता तथा भाषा बोध आदि योग्यताएँ इस आयु अवस्था के बाद विकसित होती है।
वेश्लर का विचार है कि बौद्धिक विवृद्धि कम से कम बीस वर्ष की आयु तक होती रहती है।
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इस दिशा में जो लम्बवत् अध्ययन हुए है, उनसे यह ज्ञात हुआ है कि साठ वर्ष की अवस्था तक I.Q. में वृद्धि होती रहती है। एक अन्य अध्ययन में 50 व्यक्तियों के लम्बवत् अध्यपन में यह देखा गया है कि I.Q. में 35 वर्ष तक विवृद्धि होती रहती है। इसके बाद पचास वर्ष तक यह स्थिर रहती है और पचास वर्ष की आयु के बाद इसमे मन्द अवनति प्रारम्भ हो जाती है। फिट्जगिराल्ड आदि मनोवैज्ञानिकों का भी विचार है कि बुद्धि परीक्षण सम्बन्धी निष्पादन में वृद्धि बीस वर्ष के बाद भी होती रहती है जो इस आयु के बाद बौद्धिक कार्यो में संलग्न रहते है। क अन्य अध्ययन में यह देखा गया है कि बौद्धिक प्रकार्यो पर बालक के सरक्षकों के व्यवहार का भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों में यह देखा गया है कि किशोरावस्था के बाद लड़कियो की अपेक्षा लड़को की बौद्धिक योग्यताओं में विवृद्धि अपेक्षाकृत अधिक होती है अध्ययनों में विवृद्धि अपेक्षाकृत अधिक होती है अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि सभी बौद्धिक योगयाओं में विवृद्धि समान गति से नही होती है। उदाहरण के लिए किशोरावस्था के बाद अमूर्त चिन्तन शब्द भण्डार आदि में अन्य बौद्धिक योग्यताओं की अपेक्षा अधिक विकास और विवृद्धि होती है।

