CTET UPTET Environmental Education Area Study Material in Hindi

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पर्यावरण शिक्षा का क्षेत्र (CTET UPTET Environmental Education area Study Material in Hindi)

हमारे चारों ओर के जैविक तथा अजैविक तत्व जो मानव के जीवन कोकिसी भी रूप में प्रभावित करते है, पर्यावरण के क्षेत्र में आते हैं। मानव के चारों और ऐसे अनेकों तत्व हैं ज मानव को प्रभावित करते हैं। इन तत्वों को विभिन्न वर्गों में रख सकते हैं और इनके सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में आता है। इस प्रकार जल , वायु मिट्टी ऊर्जा, उद्दोग, परिवहन के साधन, व्यवसास क्रियाएँ, आर्थिक क्रियाएँ, धार्मिक कृत्य, ऐतिहासिक घटनाएँ, कला तथा संस्कृति, भौगोलिक संरचना तथा ऐसे अन्य तथा मानव को प्रभावित करते है और इन सभी का अध्ययन पर्यावरण शिक्षा में किया जाता है। इस प्रकार अन्य पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र वनस्पतिशास्त्र, जलशास्त्र, उद्दोग तथा भूगोल, इतिहास, समुद्र शास्त्र, खगोल-विद्दा आदि से है। पर्यावरण शिक्षा में इन विभिन्न प्रभावक तत्वों के अतिरिक्त पर्यावरण के महत्व, उसकी सुरक्षा, संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण, उसके कारण उससे उत्पन्न समस्यों पर नियन्त्रण उन्हे रोकने तथा दूर करने के उपायों आदि का भी अध्ययन किया जाता है। पर्यावरण शिक्षा मानव मूल्यों तथा गुणों के विकास का कार्य भी सम्पन्न करती है। पर्यावरण शिक्षा मुख्यत: दया, सहानुभूति, अहिंसा, सह-अस्तित्व और वसुधैव- कटुम्बकम् सहयोग और परस्पर आत्म –निर्भरता की शिक्षा देती है। अत: इस गुणों के विकास को बी पर्यावरम शिक्षा के क्षेत्र के अन्तर्गत रखा जाता है। पर्यावरण मनुष्य के जन-स्वास्थ को प्रभावित करता है। इसलिए पर्यावरण शिक्षा के क्षेत्र में जन स्वास्थ्य उसकी समस्याएँ, उसकी सुरक्षा तथा उपयों आदि को भी शामिल किया जाता है। आज राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्बन्धित प्राय: प्रत्येक राष्ट्र ने कुछ –न –कुछ कानून बनाए हैं। पर्यावरणीय शिक्षा में इन संस्थाओं के कार्य –कलापों और कानूनों का अध्ययन भी किया जाता है। उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि आज की पर्यावरण शिक्षा बहु- आयमी है तथा इसका क्षेत्र अत्यधिक व्यापरक है।

पर्यावरणीय शिक्षा की आवश्यकता (Need For Environmental Education Study materials in Hindi)

आज सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरम प्रदूषम की समस्या है। मनुष्य के चारों और का पर्यावरम तथा पर्यावरण के भी घटक आपत्तिजनक स्थिति तक प्रदूषित हो चुके हैं। हवा जल तथा मृदा प्रदूषित है। वनों की मात्रा बहुत कम हो गई है, वनय् जीवों की अनेक प्रजातियों विलुप्त हो गई है, तथा अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने वाली है। ओजोन परत पर दबाव बढ़ गया है। अम्लीय वर्षा की प्राय: दुर्घटनाएँ होती रहती है, हरित गृह प्रभावों के प्रति सभी चिन्तित है, जनसंख्या वृद्धि एवं औद्दोगिकरम के कारम आज मनुष्य के सामने प्राणवायु की कमी की जटिल समस्या है, जलाभाव कूड़े- कटरे के निपटने की समस्या जैसी अनैक पर्यावरणीय समस्याएँ हमारे सामने हैं। इन समस्याओं का समाधान अकेले न तो कोई सरकार ही कर सकती है तथा न कोई गैर- सरकारी स्वयसेवी संस्था अथवा संगठन ही कर सकता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रत्येक नागरिक को आगे आना होगा। प्रत्येक नागरिक की स दशा में भागीदारी आवश्यक तथा अनिवार्य है। यह तभी सम्भव है जब प्रत्येक नागरिक को आगे आना होगा। प्रत्येक नागरिक की इस दशा में भागीदारी आवश्यक तथा अनिवार्य है। यह तभी सम्भव है जब प्रत्येक नागारिक पर्यावरण से सम्बन्धित इन समस्याओं, पर्यावरण के महत्व सके प्रदूषम से हानियाँ तथा पर्यावरम की सुरक्षा, संरक्षम और सुरक्षा के उपायों तथा विधियोसे परिचित हो, उनके पति सुरक्षा के उपायों तथा विधियों से परिचित हो उनके प्रति सजग हो तथा अपने कार्य तथा व्यवहार इस दिशा में सम्पन्न करे। इस प्रकार की सजगता तथा भावना नागरिकों में केवल मात्र शिक्षा के द्वारा ही विकसित की जा सकती है। इसलिए पर्यावरणीय शिक्षा की आज परम आवश्यकता है। यह आवश्यकता निम्नलिखित बिन्दुओं से और अधिक स्पष्ट होती है-

पर्यावरणीय शिक्षा की आवश्यकता (CTET UPTET  Need For Environmental Education Study materials in Hindi)

  1. वृक्ष पौधे आदि वनस्पतियाँ ही कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) को प्रामवायु ऑक्सीजन (O2) में परिवर्तन कर सकते है, अत: वायुमण्डल में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने हेतु पर्यावरण संरक्षण का ज्ञान भावी पीढ़ी को देना अत्यावश्यक है।
  2. पर्यावरण शिक्षा द्वारा जनसाधारण में पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षण के प्रति सजगता विकसित होगी।
  3. प्रकृति पर्यावरण तथा उसके विक्षिन्न घटकों के प्रति वैज्ञानिक एवं सही दृष्टिकोण विकसित करने के लिए पर्यावरणीय शिक्षा आवश्यक है।
  4. आज पर्यावरण से सम्बन्धित तथा जीवन मूल्यों को सकारात्मक रूप में परिवर्तित करना आवश्यक है। यह कार्य सम्पन्न करने के लिए पर्यावरणीय शिक्षा की आवश्यकता है।
  5. पर्यावरण के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए उचित रुचियों का विकास विद्दालय में ही सम्भव है, अत: पाठ्य सहगामी क्रियाओं द्वारा विद्दार्थियों को पर्यावरण शिक्षा दी जानी चाहिए।
  6. जीवन को सुखमय, व्यवहार-परक तथा प्रकृति के साथ सांमजस्य स्थापित करते हुए व्यतीत करने के लिए पर्वारणीय शिक्षा आवश्यक है।
  7. आज हमें वृक्ष –पूजन, जल-पूजन, यज्ञ आदि का वास्तविक अर्थ समझना है। इसकी सही विधियाँ सीखनी हैं। धरती को हम माता का स्वरूप क्यो कहते हैं। इन सबके अर्थ को समझने के ले पर्यावरणीय शिक्षा आवश्यक है।
  8. पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं को समझने, उनका विश्लेषण करने व उनके समाधान के लिए बौद्धिक क्षमताओं के विकास हेतु तथा निर्णय लेने सम्बन्धी कौशल के विकास हेतु पर्यावरण शिक्षा आवश्यक है
  9. पर्यावरम संरक्षण के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति उत्पन्न करने एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकस के लिए पर्यावरण शिक्षा की आवश्यकता है।

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