CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi

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भाषा और चिन्तन (Language and thought)

भाषा(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

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भाषा प्रणाली के भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है। यह कहना गलत न  होगा कि मुनष्य पशुओं से इसलिए श्रेष्ठ है क्योकि उसके पास एक भाषा है, जिसे वोग समझ सकेत है। यद्दपि पशुओं और पक्षियों की भी कोई ने कोई भाषा अवश्य होती है लेकिन उसे कोई समझ नही पाता है। यदि व्यक्ति गूँगा होता है स तो वह अपने भावों को समझाने के लिए शरीर के अंगों का सहारा लेता है जिसे उसकी शरीर की भाषा कहा जाता है भाषा के माध्यम से मनुष्य समाज में अपना एक अलग स्थान बनाता है जो उसके व्यक्तित्व के निर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। भाषा जन्म के स्थान पर उत्पन्न होती है। बच्च जन्म के बाद रोता4 है जो उसकी प्रथम भाषा है। बास्तव में भाषा भावों के सम्प्रेषण का एक माध्यम है। भाषा बौद्धिक क्षमता को भी अभिव्यक्त करती है।

बहुत से लोग वाणी और भाषा दोनो का प्रयोग एक –दूसरे के पर्यायवाची के पुप में करते है। परनेतु दोनों में बहुत अन्तर होता है। हरलॉक ने दोनों शब्दों को निम्नलिखित रुप से स्पष्ट किया है

भाषा में सम्प्रेषण के वे सभी साधन आते है जिसमें विचारों और भावों को प्रतीकात्मक बना दिया जाता है जिससे कि अने विचारों और भावों को दूसरे से अर्चथपूर्म ढंग से कहा जा सके

वाणी भाषा का एक स्वरुप हे जिससे अर्थ को दूसरों को व्यक्त करने के लिए कुछ ध्वनियां या शब्द उच्चारिक किए जाते है।
अत: कहा जा सकता है कि वाणी भाषा का ओक विशिष्ट ढंग है। वाणी मनोक्रियात्मक कौशल है यह केवल मासंपेशियों तथा वाचिक तन्त्र में केवल सहायक ही नही है अपितु इसका मानसिक पाता है जिसमें अर्थ जुड़ा रहता है सभी बच्चों की आवाज वाणी बह होती है जसमें पर्याप्त नियन्त्रण होता है विना नियन्त्रण और अर्थ के बोली गई वाणी को तोता वाणी कह सकते है वाणी अर्थयुक्त होती तथा जिस समाज में बोली जाए उसे सभी लोग समझ सके इन दोनो कसौटियों का वाणी में होना आवश्यक है। भाषा व्यपक सम्प्रत्यय है। वामी, भाषा का माध्यम है, भाषा कोई भी हो सकती है, जैसे – अंग्रेजी, फ्रेन्च, अरबी फारसी इत्यदि। भाषा अर्थ हीन भी हो सकी है जिसमें संकेत हाव, भाव एवं अन्य बहुत सी चीजे आती है। पक्षी और पशु की भी एक भाषा है कहा रजाता है कि पुश पक्षियों के पास वाणी नहीं होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि वाणी बह मनोक्रियात्मक माध्यम है जिसे उसके अपने समुदाय के लोग समझते है और प्रभावित होते है कहा जाता है

वाणी ऐसी वोलिए मन का आपा खोय।

औरन को शीतल करे आपनहु शीतल होय।।

अर्थात वाणी में विचार, भाव मानसिक संचेतना आदि गुण निहित होते है जो किसी व्यक्ति और समाज को प्रभावित करते है। उदाहरण के लिए कहा जाता है किर स्वर साम्रज्ञी लता मंगेशकर की वाणी कितनी मधुर एवं रससिक्त एव लावण्यमयी ह2। लेकिन भाष तो दूसरी चीज है जिसमें विभिन्न प्रकार की बोलियां एवं तरीके आते है भाषा में चही वाणी सन्निहित होती है। आदिम मानव भी अपने विचारों का आदान प्रदान करता था उसमे शचरीर का संकेत गले की आवाज चिल्लान अथवा विभिन्न प्रकार की आवाजे (अलग-अलग कार्यों के लिए ) करना भी एक भाषा थी लेकिन धीरे- धीरे भाषा विज्ञान का विकास हुआ इसे व्यवस्थित नियम युक्त एवं संगठित किया गया। प्रस्तुत अध्याय में सुविधा के लिए भाषा और वाणी को एक ही अर्थ में प्रयोग किया गया है।

भाषा का महत्व(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

भाषा व्यक्तित्व का एक आईना है जैसा व्यक्ति होता है उसी प्रकार की उसकी भाषा होती है। भाषा से समाज में सम्मान मिलता है और उसी से अपनान अर्थात भाषा में आकर्षण और विकर्षण दोनों होतो हैं। भाषा के महत्व को निम्नलिखित प्रमुख बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है

  1. इच्छाओं और आवश्यकताओं की सन्तुष्टि भाषा व्यक्ति को अपनी आवश्यकता, इच्छा पीड़ा अथावा मनोभाव दूसरे के समक्ष व्यक्त करने की क्षमता प्रदान करती है जिससे दूसरा व्यक्ति सरलता से उसकी आवश्यकता को समझकर तत्सम्बन्धी समाधान प्रदा करता है उदाहरण के लिए एक बालक यदि केवल रोता है अपन मनोभावों तथा आव्यकताओं (भूख) को दूसरे के सामने व्कत् नही कर पाता है तो मात पिता को उसे समझने में कठिनाई होती है। लेकिन वही जब बह आपनी जुबान से वोलकर दूध या भोजन की माँग करता हो तो तुरन्त इसकी पूर्ति हो जाती है और उसे सन्तुष्ठि मिलती है।
  2. ध्यान खीचने के लिए सभी बालक चाहते है कि उनकी और लोग ध्यान दै इसलिए वे अभिभावकों से प्रश्न पूछकर कोई समस्या प्रस्तुत करके तथा विभिन्न तरीको का प्रयोग कर उसका ध्यान आपनी और खीचते है। जों बच्चे चुप रहते है या बोलते नही उककी कभी –कभी उपेक्षा हो जाता है।
  3. सामाजिक सम्बन्ध के लिए महत्व वाणी से अपने भावों करो बालक समाज में अभिव्यक्त करता ह3 जिससे विचारो, भावों को लोग समजते है इससे समाज के बीच आपसी ताल मेल विकसित होता है जो बच्चे खुलकर आपसी अपने विचारों भावो  को दूसरो क् सामने रखते है उन्हे समाज में सबसे अधिक स्वीकृति मिलती है। दूसरे बालक उसी बालक के साथ खेलना उठना बैठना तथा मित्रता करना पसन्त करत् है जिनकी अभिव्यक्ति होती है जो अन्तर्मुखी होते है। बालक अपनी भाषा के द्वारा वेयक्तिक एवं सामाजिक समायोजन होता है।
  4. सामाजिक मूल्यांकन के लिए महत्व बालक समाज में क्या बोलता है? कैसे बोलता है? इसका मूल्यांकन समाज के लोग सामाजिक पृष्ठभूमि में करते है। उसकी भाषा ही उसकी योग्यत स्तर तथा यौन उपयुक्तता की मानदण्ड होती है इससे बालक क भावों एवं विचारों का मूल्यांकन होता है।
  5. आत्म मूल्यांकन में महत्व बालक जब समाज में बोलता है है तो उसके सुनने बालो की उसके प्रति क्या प्रतिक्रिया होती है? दूसरे लोग उसके विषय में क्या समझते है? उनकी भाषा को सुकर बालक स्वंय का मूल्यांकन करता है कि लोग उससे प्रभावित हैं या नही। समाज का दृष्टिकोण उसके प्रति किस प्रकार का है?
  6. शैक्षिक उपलब्धि के महत्व कक्षा में जिन बालकों की भाषा एवं उच्चारण जितना अच्छा होता है उसकी शैक्षित उपलब्धि भी उतनी ही अच्छी होती है। भाषा के माध्यम से ही एक छात्र अपनी कक्षागत समास्याओं को छात्रों एवं अध्यापको के सामने स्पष्टता से रखकर उसे समझ सकात 4है लेकिन जिसकू भाषा जिसकी भाषा कम प्रभावशाली है उस पर कोई ध्यान नही देता है। प्राय: देखा जाता है कि जिसकी भाषा और लिखावट कमजोर है वे कक्षा में अन्य छात्रों से कम अंक प्राप्त करते है यद्दपि उनकी बौद्धि क्षमता में कमी नही होती है।
  7. दूसरे क विचारों को प्रभावित करने के लिए जिन बच्चों की भाषा प्रिय, मधुर एवं ओजस्वी होती है वे अपने समूह, परिवार अथवा समाज के व्यक्तियों को प्रभावित करते है लोग उन्ही को अधिक महत्व देते है जिनका भाषा व्यवहार प्रभावपूर्ण होता है।

भाषा विकास के सिद्धान्त(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

मनुष्य की भाषा कैसे विकसित होती है? उसकी प्रक्रिया क्या है? शब्दों का अर्थों में कैसे समावेश होता है इसको जाने क लिए भाषा विकास के सिद्धान्तों को समझना आवश्यक है। मनुष्य बोलने की योग्यता किस प्रकार अर्जित करता है इस विषय पर विदानों ने अपने अध्ययनोम के आधार पर सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जिसमें से कुछ निम्नलिखित है

  1. परिपक्वता का सिद्धान्त परिपक्वता से तात्पर्य है भाषा अवयवों एवं स्वरों पर नियन्त्रण होना बोलने में जिह्रा, गला तालू, होठ, दाँत तथा स्वर यन्त्र आदि जिम्मेदार होते है इनमें किसी भी प्रकार की कमजोरी या कमी वाणी को प्रभावित करती है। इन सभी अंगों मे जब परिपक्वता होती है तो भाष प नियन्त्रम चहोता है और अभिव्यक्ति अच्छी होती है। विद्वानों का मत है कि भाषा विकास स्वरयन्त्र की परिपक्वता पर निर्भर करता है जिनकी स्वरयन्त्र में परिपक्वता नही होती है वे शब्दों का उच्चारण नहीं कर पात है। गूँगे व्यक्तियों में स्वरयन्त्रों का विकास नहीं होता इसलिए उनमें बोलने की क्षमता नही होती है।
  2. अनुबन्धन का सिद्धान्त भाषा विकास में अनुबन्धन या साहचर्च का बहुत योगदान है। शैशवावस्था में जब बच्चे शब्द सीखते है, तो सीखना अमूर्त नहीं होता है । वरन् किसी मूर्त बस्तु से जोडकर उन्हे शब्दों की जानकारी दी जाती है उदाहरण के लिए कलम कहने के साथ उन्हे  या दूध कहने पर उन्हे पानी या दूध दिखाया जाता हैष चाचा या ताउ को संकेत के सहारे प्रत्यक्ष रुप से बताया जाता है। इससे बच्चे उस विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति से साहचर्य स्थापित कर लेते है और अभ्यास हो जाने पर सम्बन्धित वस्तु या व्यक्ति की उपस्थिति पर सम्बन्धित शब्द से सम्बोधित करते है उददीपक और प्रतिक्रिया के बीच सम्बन्ध स्थापित हॊने कॊ ही अनुबन्धन कहा जाता है। इसीलिए छोटी कक्षाओं में लिखने के लिए शिक्षोपकरणों का प्रयोग किय़ा जाता है स्किनर का कहना है कि अनुबन्धन द्वरा भाषा विकास की प्रक्रिय4 को सरल बनाया जा सकात है
  1. अनुकरण का सिद्धान्त चैपिनीज, शर्ली कर्टी तथा वैलेन्टाइन आदि मनोवैज्ञानिको ने अनुकरण के द्वार भाष सीखने पर अध्ययन कया है इनका मत है कि बालक अपने परिवारजनों तथा साथियों की भाषा का अनुकरमण करके सीखते है जैसी भा4ष जिस समाज चया पिरवा4र में बेली जाती है बच्चे उसी भाषा को सीखते है यदि कोई भाषा में दोष है तो अनुकरण से वह भी बच्चे सीख तेत् है। इसे सामाजिक अधिमग भी कहा जाता है बालक समाज से ही विशाल शब्दो का भण्डार सीख पात है साथ ही बोलने तौर तरीके भी सीख जाता है
  2. चोमस्की का भाष अर्जित करने का सिद्धान्त चोमस्की का कहना है कि बच्चै शब्दों को निश्चित सख्या से कुछ निर्माण करना सीख जाते है। इन शब्दों से नए –नए बाक्यों एवं शब्दों का निर्माण होता है इन बाक्यो का निर्माण बच्चे जिन नियमों के अन्तर्गत करते है उन्हें चोमस्की ने जेनेरेटिव ग्रामर की संज्ञा प्रदान की हा

उपरोक्त माडॉल स स्पष्ट हे कि बालक समाज, परिवार तथा3 विद्दालय से शब्दों एवं वाक्यों का संग्रह करते है। इन शब्दों को वे संगठित एवं व्यवस्थित करते है। इनकी समझ पैदा करते है और अन्त में इन्ही शब्दों के आधार पर नवीन वाक्यों की रचना करते हैं।

भाषा विकास की अवस्थाएँ(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

अध्ययनों से भाष विकास की विभिन्न अवस्थाओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। सुविधा की दृष्टि से इसे दो भागों में बाँट सकते है।

  1. भाषा का प्राम्भिक रुप –रोना, बलबलाना, हाव भाव या संकेत आदि
  2. वास्तविक भाषा की अभिव्यक्ति –आकलन या बोध शक्ति शब्द भण्डार , बाक्य निर्माण, शुद्ध उच्चारण आदि।

भाषा विकास को प्रभावित करने वाले कारक(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

सभी बच्चों का भाषा विकास एक जैसा नही होता है किसी की भाषा विकास की गति तीव्र होती है तो किसी की विलम्बित या मन्द गति। भाषा विकास पर कुछ तत्वों का प्रभाव पड़ता है जिससे उनका विकास प्रभावित होता है। इनमें से प्रमुख तत्व निम्नलिखित है

  1. स्वास्थ्य जिन बच्चों का स्वास्थ्य जितना अच्छा होता है उनमें भाष विकास की गति उतनी तीव्र होती है क्योकि सामाजिक समूहों से उन्हे अच्छी प्रेरण मिलती है, वे बच्चे अपने समूह के साथ खेलते है, अत: प्रतिक्रिया (Interaction) करते है, लेकिन बीमार बच्चे समूह में खेल नही पाते शारीरिक अवयवों का भी विकास बाधित होता है। स्मिथ ने बच्चों की भाषा पर बीमारी के प्रभावों का अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला की बीमार बच्चों में  भाषा विकास की गति धीमी होती है। इसी प्रकार का अध्ययन लॉवेल (Lovel) मारकेल (Markel) ने भी किय और गाया कि जो बच्चे लम्बी अबधि कर बीमार रहत है उनमे भाषा विकास कमजोर होता है।
  2. बुद्धि हरलॉक के अनुसार जिन बच्चों का बौद्धक स्तर उच होता है उमें भाष विकास अपेक्षाकृत कम बुद्धि से अच्छा होता है। स्पाईकर और इरविन का मत है कि बुद्धिलब्धि और भाषा और भा, सम्बन्धी योग्यता में घनिष्ठ सम्बन्ध है। टरमैन, फिशर और यम्बा का मानना है कि तीव्र बुद्धि बालको का उच्चारण और शब्द भण्डार अधिक होता है। प्राय: देखा जाता है कि प्रतिभाशाली बालक अपनी अवस्था के बालको से पहल बोलना सीख लेते है, उनके शब्द भण्डर की क्षमता भी सामान्य बालको से अधिक होती है तथा वे बुहत स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण भी करते है
  3. सामाजिक –आर्थिक स्थिति यह देखा गया है कि जिन बालको का सामाजिक आर्थिक स्तर निम्न चहोता वे देर में बोलना सीखते है। गैसिल जरचसील्ड आदि मनोवैज्ञानिकों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई कि उच्च वर्ग के शिशु जल्दी बोलना सीखते है, अधिक बोलते है तथा उनका उच्चारण शुद्धि होता है। आइंसटीन, डेविस, स्कील्स, इत्यादि ने अनाथ बच्चों के अध्ययन सेपाया कि इन बच्चों में भाषागत विकास कम होता है। इनका शब्द भण्डार भी कम होता है प्राय: यह भी देखा जाता है कि ग्रामीण क्षेत्र में पढने वाले बच्चों की शाब्दिक क्षमता शहरी या अन्य पब्लिक स्कूल  में पढने लाले बच्चो से कम होती है
  4. लिंगीय भिन्नता वाणी विकास में लिंग का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है इरविन और चेन (Irwin and Chen) ने लिंगीय भेद का अध्ययन करके निष्कर्ष दिया है कि प्रथम वर्ष में बालक एवं बालिकाओं की क्षमता बालकों से अधिक हो गई। बालिकाओं का भाष प्रवाह बालको से अच्छा रहा। वालिकाएँ जल्दी बोलना भी सीखती है, जहाँ बालक छोटे –छोटे वाक्य बोलते है वही लाड़किया बडे वाक्यों को बोलने में सभम हो जाती है बालिकाएं बालकों की अपेक्षा शुद्ध उच्चारण करती है।
  5. परिवार का आकर अकेला बालक या छोटे परिवार में बालक की भाषा शक्ति का विकास बडे आकार के परिवार से अच्छा होता है क्योकि छोटे परिवार में माता –पिता बच्चे के प्रशिक्षण उनसे वार्तालाप पर अधिक ध्यान दे पाते है जबकि बडे परिबार में समय कम मिलता है
  6. बहुजन्म कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जनसे प्र्माणित होता है कि यदि क साथ अधिक सन्ता4ने उत्पन्न होती है तो उनमें भाषा विकास विलम्ब से होता है। इसका कारण हे कि बच्चे एक दूसरे का अनुकरण करते है और दोनो ही अपरिपक्व होत है उन्हे उपयुक्त प्रतिमान मिल नही पाता उदाहरण के लिए यदि एगक बच्चा गलत उच्चारण करता है तो उसी की नकल करते दूसरा भी वैसा ही उच्चारम करेगा
  7. दि- भाषावाद यदि दि भाषा भाषी परिवार है, उदाहरम के लए यदि पिता हिन्दी वोलने वाला और माँ शुद्ध अंग्रेजी बोलने वाली हो तो ऐसे में बच्चो का भाषा विकास प्रभावित होता है वे भ्रमित हो जाते है कि कौन सी भाषा सीखे। आजकल देखा जा रहा है कि बच्चों की भाषा क्षमता क्षीण हो रही 8है उसका बड़ा ही स्पष्ट कारण है हिन्दी भाषा –भाषी परिवार से उत्पन्न हुए बच्चों का 3 वर्ष की आयु में अंग्रेजी स्कूलों में प्रवेश करा दिया जात है। जहाँ अंग्रेजी क अतिरिक्त दूसरी भाषा वोली ही नही जाती है और जैसे ही बालक कौन-सी भाषा सीखे यह उसके सामने दुविधा होती है। अंग्रेजी भाषा विकास अवरुद्ध हो जाता है या इसमें अपेक्षित सफलता नही मिलती।
  8. परिवक्वता आवश्यक परिपक्वता के अभाव मे भाषा का विकास प्रभावित होता है। हरलॉक का कहना है कि भाषा का प्रशिक्षण देते समय स बात का ध्यायन रखना चाहिए कि बच्चों में आवश्यक परिपक्वता आ चुकी है या नहीं भाषा विकास में फेफडे, स्वरयन्त्रों जीभ दाँत तालू, होठ तथा वाणी केन्द्र (मस्तिष्क में स्थित होतै है) का परिपक्व होना जरुरी है ये अंग जितने अधिक परिपक्व होते है भाष विकास उतना ही अधिक होता है।
  9. संवेगात्मक तनाव जिन बच्चों के संवेगोंका कठोरता से दमन कर दिया जाता है ऐसे बच्चों का भाषा विकास देस में होता है उदाहरण के लिए यदि एक वर्ष के शिशु को सौतेली माँ कटु या कठोर स्वभाव की मिल जाए और बात वात पर उस झिड़कना, ड़ाँटना, पीटना तथा उपेक्षित करती है तो बालक का भाष विकास प्रभावित हो जात है वह दैर में बोलता है तथा स्पष्ट नहीं बोल पाता।
  10. व्यक्तित्व कुछ अध्ययनों से यह भी स्पष्ट हो चुका है कि जो बच्चे उत्साही होते है उनमें भाषा विकास शान्त स्वभाव के बच्चों से अधिक होता है। फुर्तीले, चुस्त एवं बहिर्मुखी स्वभाव वाले बच्चों का भाषा विकास तीव्र होता है।
  11. प्रशिक्षण विधि अधिनायकवादी प्रशिक्षण जिसमें बच्चों की भावनाओं का ध्यान नही रखा जाता है किसी चीज की डाँट कर सिखाया जाता है तो ऐस प्रशिक्षण में भाषा का विकास नही होता जिस परिवार या विद्दायलय में जनतान्त्रिक विधियों का प्रयोग होता है वालक को स्वतन्त्रता होती है, उसमें भाषा का विकास तीव्र होता है। भाषा सिखाने के लिए मूर्त से अमूर्त सरल से कठिन ज्ञान से अज्ञान की र चलने के सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए उगाहरण के लिए मातृ भाषा से अंग्रेजी सिखाई जाए तो आसान होती है एक साथ एक भाषा का प्रशिक्षण हो लेकिन यह देखा जा रहा है कि भारत वर्ष के आधुनिक पब्लिक स्कूलों में शिशुओं को एक साथ दो स अधिक भाषाएं सिखाई जाती है जो उचित नहीं है एक भाषा (मातृ भाषा ) का पूर्ण ज्ञान हो जाए तो उस भाषा की सहायता से दूसरी भाष सिखाना उचित होता है

भाषा दोष(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

यदि बालक अपने स्वर यन्त्रों पर नियन्त्रण नही कर पाता, तो उसमें भाषा दोष उत्पन्न हो जाता है। ऐसे बालक समाज से कतराने लगत है। इनमें हीनता की भावना विकसित हो जाती है, ये अकेले में रहते है किसी के सामने बोलने में झिझताते है भाषा दोष का प्रभाव बालक के जीवन में अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ता है उनकी शैक्षित उपलब्धि भी प्रभावित होती है। इन बालकों को पिछड़ा बालक कहा जाता है मुख्यत: ये भाषा दोष निम्नलिखित प्रकार के है

  1. ध्वनि परिवर्तन
  2. अस्पष्ट उच्रण हकलाना
  3. हकलाना
  4. तुतलाना
  5. तीव्र अस्पष्ट वाणी

चिन्तन(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

चिन्तन एक उच्च ज्ञानात्मक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा ज्ञान संगठित होता हैष इस मानसिक प्रक्रिया में बहुधा स्मृति, कल्पना, अनुमान आदि मानसिक प्रतिक्रियाएँ सम्मिलित होती है। आइज्रनेक और इसके साथियों के अनुसार  कार्यात्मक परिभाषा के रुप में चिन्तन काल्पनिक जगत में व्यवस्था स्थापित करता है। यह व्यवस्था स्थापित करना वस्तुओं से प्रतीकात्मकता से भी सम्बन्धों की व्यवस्था भी चिन्तन है।

कॉलिन्स और ड्रेवर के अनुसार, चिन्तर को जीव- शरीस क वातावरण के प्रति चैतन्य समायोजन कहा जाता है। इस रुप में विचार स्पष्टत: मानसिक स्तर पर हो सकते है, जैसे – प्रत्यक्षानुभव और प्रत्यानुभव

प्रत्येक प्रकार के चिन्तन की कोई न कोई दिशा अथाव लक्ष्य अवश्य होता है। चिन्तन में बालक क्रियाशील रहता है, यह एक प्रकार का अन्तरिक सम्भाषण है। चिन्तन वस्तुओं प्रतिमओं और प्रतीकों आदि किसी के भी सम्बन्ध में हो सकता है।
चिन्तन का विश्लेषण(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

बालकों के चिन्तन का विश्लेषण निम्न प्रमुख पदों के आधार पर किया जा सकता है

  1. चिन्तन में सर्वप्रथम समस्या उपस्थित होती है यह देखा गाय है कि बच्चों के सामने जब कोई समस्या उपस्थित होती है तो वह समस्या से सम्बन्धित क्षेत्र में कठिनाई का अनुभाव करता है कठिनाई को दीर करने के लिए बह चिन्तन करता है। बालक समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषण करके देखता है कि समस्या क्या है?
  2. अनुमान समस्या का विश्लेषण करते समय बालक वर्तमान अनुभावों को अपने गत अनुभवों के आधार पर समान सम्प्रत्ययों की श्रेणी में रखता है और इसके आधार पर बह समस्या समाधान के सम्बन्ध में अनुमान लगाता है।
  3. समस्या समाधान जब बालक पुराने अनुभवो के सम्बन्ध में अनुमान करने लगा जाता है तो उसके मस्तिष्क में समस्या के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के समाधान उपस्थित होने लगते है। चिन्तनकर्ता में ये विभिन्न प्रकार के समाधान साहचार्यो के आधार पर उपस्थित होते है। चिन्तनकर्ता इन अनेक समाधानों में से समस्या से सम्बन्धित केवल उपयुक्त समाधान को ही स्वीकार करता है इन समाधानों पर चिन्तन करते
  4. निर्णय जब चिन्तनकर्ता के मस्तिष्क में किसी समस्या के सम्बन्ध में कई समाधान उपस्थित हो जाते है, तो उपयुक्त समाधान को चुनने का निर्णय लेता है, चिन्तनकर्ता इस चुने गए समाधान को चुनने के लिए सार्थकता चिन्तन के द्वारा प्रमाणित करने का भी प्रयास करता है।

चिन्तन तथा कल्पना(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

चिन्तन तथा कल्पना- दोनों ही ज्ञानात्मक एवं रचनात्मक मानसिक प्रक्रियाएँ है। दोनों ही प्रक्रियाओं में कुछ महत्वपूर्ण अन्तर निम्न प्रकार हैं

  1. चिन्तन प्रक्रिया की सहायता से बालक समस्या के विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करता ह, क्योकि इन पहलुओं को समझने बिना समस्या समाधान सम्भव नही हो सकता दूसरी ओर कल्पना में समस्या समाधान की परिस्थिति को नए ऩए रुपों में देखा जाता है
  2. चिन्तन में तर्क की प्रधानता होती है जबकि कल्पना में तर्क का अभाव होता है। समस्या समाधान में तर्क की सहायता से सूक्ष्म पहलुओं को जाना जाता है
  3. बालक में चिन्तन बहुधा समस्या की उपस्थिति पर प्रारम्भ होता है अर्थात जब बालक के सामने कोई समस्या आती है तभी उसमें चिन्ता की प्रक्रिया होती है, व्यर्थ में बालक चिन्तन नही करता है। दूसरी ओर कल्पना के लिए परिस्थिति या समस्या की विशेष आवश्यकता नहीं होती है क्योकि चिन्तन व्यर्थ में भी हो सकता है।
  4. दोनो ही मानसिक प्रक्रियाओं की प्रवृत्ति निर्धारक प्रकार की है। चिन्तन की यह प्रवृत्ति कल्पना की अपेक्षा अधिक चेतिन होती है। चिन्तन को एक विशेष दिशा में प्रयत्न और भूल का अभाव होता है।
  5. चिन्तन में समस्या समाधान में प्रयत्न और भूल की क्रिया रहती है जबकि कल्पना में प्रयत्न और भूल का अभाव होता है।
  6. चिन्तन वास्तविकता से सम्बन्धित होता है परन्तु कल्पना का सम्बन्ध बास्तविकता से हो भी सकत् है और नहीं भी।

चिन्तन तथा भाषा(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

चिन्तन प्रक्रिया प्रतीक और चिन्हों के आधार पर चलती है। प्रतीक और चिन्हों का आधार भाषा होती है। चिन्तन के समय बालक के अन्दर आन्तरिक भाषण होताहै कई बार चिन्तिन करते समय बालक बोलने लगता है। कुछ अध्ययनों में यह देखा गाय है कि जिस बालक मेंभाषा की योग्यता जितनी अधिक होती है, उसमें चिन्तन की योग्यता भी उसी रुप में उतनी ही आधिक होती है। क्योकि भाषा- वृद्धि के साथ साथ बालको में ज्ञान –वृद्धि से चिन्तन शक्ति का भी विकास होता है। भाषा के द्वारा बालक चिन्तन को व्यक्त भी कर सकता है। बालक भाषा के द्वारा अपने अथवा दूसरों के चिन्तन को रिकॉर्ड कर सकता है और इस प्रकार वह अपने चिन्तन का दूसरो  को लाभ उठा सकता है। अत: कहा जा सकता है कि चिन्तन के लिए भाषा आवश्यक ही नही अपितु चिन्तन को व्यक्त करने का साधन भी है। भाषा के अभाव में चिन्तन को व्यक्त करना कठिन है। जहाँ भाषा से चिन्तन का विकास होता है वहाँ चिन्तन भाषा को भी विकसित करता है। अत: कहा जा सकत्है कि चिन्तन और भाषा दोनों में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

पहले यह विश्वास किया जाता था कि विचार प्रतिमा रहित होते है अथवा प्रतिमा सहित होते हैं कुछ मनोवैज्ञानिक यह मानते थे कि विचार प्रतिमा रहित होते है और कुछ यह मानते थे कि विचार प्रतिमा सहित होते है, परन्तु आज यह माना जाता है कि विचार दोनो प्रकार के होते है, प्रतिमारहित भी और सहित भी चिन्तन के लिए यद्दपि भाषा बहुत आवश्यक है परन्तु भाषा के बिना भी चिन्तन सम्भव है क्योकि व्यक्ति उन वस्तुओं के सम्बन्ध में भी चिन्तन करते देखा गया है कि जिका बह नाम तक भी नही जानता है। कभी कभी चिन्तन को स्पष्ट करने के लिए भाषा पर्याप्त नही होती है, इस अबस्था में चिन्तन को चित्रों और मॉडल क द्वारा व्यक्त किया जाता है।

बाल चिन्तन के प्रकार(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

बालकों में चिन्तन के मुख्यत: चार प्रकार है, जिनाका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार से है

  1. प्रत्यक्षात्म चिन्तन यह बह चिन्तन है जो वस्तुओं और परिस्थितियों के प्रत्यक्षीकरण से सम्बन्धित होता है। बालक अपने चारों और के भौतिक और मनोवैज्ञानिक वातवरण में वस्तुओ और परिस्थितियों को देखता है या प्रत्यक्षीकरम करता है। उनके सम्बन्ध में जो चिन्तन होता है वह प्रत्यक्षात्मक चिन्तन कहलाता है।
  2. कल्पनात्मक चिन्तन जब उददीपन, वस्तु या पदार्थ उपस्थित नही होता है तब उसकी कल्पनाकी जाती है। नके अभाव में इनकी मानसिक प्रतिमा बनाकर इन प्रतिमाओं से सम्बन्धित चिन्तन कल्पनात्मक चिन्तन कहलाता है।
  3. प्रत्ययात्मक चिन्तन यह अपेक्षाकृत अधिक उच्च प्रकार का चिन्तन है। इसकी बालको में तभी अभिव्यक्ति होती है जब बालकोंमें प्रत्ययों का निर्माण प्रारम्भ होता है एक बालक में जितने ही अधिक प्रत्यय निर्मित होते है उसमे उतना ही अधिक प्रत्ययात्मक चिन्तन पाया जाता है इस प्रकार के चिन्तन को विचारात्मक चिन्तन भी कहते है। स्थान, आकर, भार, समय, दूरी और संख्या आदि सम्बन्धी प्रत्यय बालकों में प्रारम्भिक आयु स्तर पर ही बन जाते है। इन प्रत्ययों के सम्बन्ध में चिन्तन भी प्रत्ययात्मक चिन्तन कहलाता है।
  4. तार्कि चिन्तन यह अपेक्षाकृत सर्वाधिक उच्च प्रकार का चिन्तन है। यह मूलत: भाषा सम्प्रेषण पर आधारित होता है।

चिन्तन का विकास(CTET UPTET Language and thought Study Material in Hindi)

चिन्तन का विकास भाषा के विकास के कुछ समय बाद प्रारम्भ हो जाता है। लगभग एक दो बर्ष  की अबस्था में उसमें चिन्तन का विकास प्रारम्भ हो जाता है बालक में सर्वप्रथम प्रत्यक्षात्मक चिन्तन का विकास प्रारम्भ होता है बालक के चारों और जो मूर्त वस्तुएँ और उत्तेजनाएं होती है। सर्वप्रथम बह उनके सम्बन्ध में चिन्तन प्रारम्भ करता है उदारहरण के लिए – मेज, कुर्सी, खिलौने , तथा परिवार के सदस्यों आदि के सम्बन्ध में बह सर्वप्रथम चिन्तन  प्रारम्भ करता है । पियाजे का विचार है कि लगभाग सात वर्ष की अवस्था तक बालक की प्रवृत्ति आत्मकेन्द्रित प्रकार की होती है अत: बालक अपने स्वयं के सम्बन्ध में ही चिन्तन अधिक करता है। उसमें इस अवस्था के चिन्तन में तार्किकता का अभाव होता है लगभग पाँच –छ: वर्ष की अवस्था से बालक में कल्पनात्मक चिन्तन तथा प्रत्ययात्मक चिन्तन प्रारम्भ हो जाती है

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