CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

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CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi : 4 समाजीकरण प्रक्रिया (Socialization Process)

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समाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो नवजात शिशु को समाजीकरण प्राणी बनती है | इस प्रक्रिया के अभाव में व्यक्ति समाजिक प्राणी नही बन सकता | इसी में सामाजिक व्यक्तित्व का विकास होता है | सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के तत्वों का परिचय भी इसी से प्राप्त होता है | समाजीकरण से न केवल मानव जीवन का प्रभाव अखण्ड तथा सतत रहता है, बल्कि इसी से मानवोचित गुणों का विकास भी होता है और व्यक्ति सुसभ्य व सुसंकृत भी बनता है | संस्कति का हस्तांतरण भी समाजीकरण की प्रक्रिया के बिना व्यक्ति सामाजिक गुणों को प्राप्त नही कर सकता | अत: यह एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है |

शैक्षिक समाजशास्त्र के विद्वान् बोगार्ड्स ने समाजीकरण की परिभाषा इस प्रकार दी है- समाजीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति सामाजिक कल्याण हेतु एक-दुसरे पर निर्भर रहकर व्यवहार करना सीखते है, और जिसके द्वारा सामाजिक आत्म-नियन्त्रण, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा सन्तुलित व्यक्तित्व का अनुभव प्राप्त करते है |

समाजीकरण का कार्य समाज में रहकर ही सम्भव है, समाज से अलग रहकर नही | यह व्यक्ति को सामाजिक परम्पराओ, प्रथाओ, रूढ़ियो, मूल्यों, आदर्शो आदि का पालन करना और विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में अनुकूलन करना सिखाता है | समाजीकरण द्वारा संस्कृति, सभ्यता और अन्य अनगिनत विशेषताएं पीढ़ी-दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती है और जीवित रहती है |

समाज और बालक/CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

पालन-पोषण का तरीका, सहानुभूति का स्तर एवं प्रकार, सहकारिता, निर्देश, आत्मीकरण, पुरस्कार एवं दण्ड अनुकरण, सामाजिक शिक्षण, इत्यादि बालक के समाजीकरण की प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण कारक है |

बालक के समाजीकरण पर पालन-पोषण का गहरा प्रभाव पड़ता है | जिस प्रकार का वातावरण बालक को प्रारम्भिक जीवन में मिलता है तथा जिस प्रकार से माता-पिता बालक का पालन पोषण करते है उसी के अनुसार बालक में भावनाएं तथा अनुभूतियाँ विकसित हो जाती है | इसका अर्थ यह है की जिस बालक की देख-रेख उचित ढंग से नही होती उसमे समाज विरोधी आचरण उसी समय करता है जब वह स्वंय का समाज के साथ व्यवस्थापन नही कर पता | इस द्रष्टि से उचित पालन-पोषण ठीक प्रकार से किया जाए |

सहानुभूति :- पालन-पोषण की भांति सहानुभूति का भी बालक के समाजीकरण में गहरा प्रभाव पड़ता है | ध्यान देने की बात यह है की शैशवावस्था में बालक अपनी सभी आवश्यकताओ आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहता है | दुसरे शब्दों में, अन्य व्यक्तियों द्वारा बालक की आवश्यकताएँ पूरी की जाती है | यहाँ इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है की बालक की सभी आवश्यकताओ को पूरा करना ही सब कुछ नही है वरन उसके साथ सहानुभूति के द्वारा बालक में अपनत्व की भावना विकसित होती है, जिसके परिणामस्वरूप वह एक-दुसरे में भेदभाव करना सीख जाता है | वह उस व्यक्ति को अधिक प्यार करने लगता है, जिसका व्यवहार उसके प्रति सहानुभूतिपूर्ण होता है |

सहकारिता :- व्यक्ति को समाज ही सामजिक बनता है | दुसरे शब्दों में, समाज की सहकारिता बालक को सामजिक बनाने में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है | जैसे जैसे बालक अपने साथ अन्य व्यक्तियों का सहयोग पाता जाता है, वैसे-वैसे वह दुसरे लोगो के साथ अपना सहयोग भी प्रदान करना आरम्भ कर देता है | इसमें उसकी सामजिक प्रवृत्तियाँ संगठित हो जाती है |

निर्देश :- सामाजिक निर्देशों का बालक के समाजीकरण में गहरा हाथ होता है | ध्यान देने की बात यह है की बालक जिस कार्य को करता है, दुसरे शब्दों में, वह उसी कार्य को करता है, जिसको करने के लिए उसे निर्देश दिया जाता है | इस प्रकार हम देखते है की निर्देश सामाजिक व्यवहार की दिशा को निर्धारित करता है |

आत्मीकरण :- माता-पिता, परिवार तथा पडोस की सहानुभूति द्वारा बालक में आत्मीकरण की भावना का विकास होता है | जो लोग बालक के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करते है, उन्ही को बालक अपना समझने लगता है तथा उन्ही के रहन-सहन, भाषा तथा आदर्शो के अनुसार व्यवहार करने लगता है |

अनुकरण :- समाजीकरण का आधारपूर्ण तत्व अनुकरण है | ध्यान देने की बात यह है की बालक में अनुकरण का विकास परिवार तथा पडोस में रहते हुए होता है | दुसरे शब्दों में, बालक परिवार तथा पडोस के लोगो को जिस प्रकार का व्यवहार करते हुए देखता है, वह उसी का अनुकरण करने लगता है |

सामाजिक शिक्षण :- अनुकरण के अतिरिक्त सामाजिक शिक्षण का भी बालक के समाजीकरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है | ध्यान देने की बात यह है की सामाजिक शिक्षण का आरम्भ परिवार से होता है जहाँ पर बालक माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य सदस्यों से खान-पान तथा रहन-सहन आदि के बारे में शिक्षा ग्रहण करता रहता है |

पुरस्कार एवं दण्ड :- बालक के समाजीकरण में पुरस्कार एवं दण्ड का भी गहरा प्रभाव पड़ता है | जब बालक समाज के आदर्शो तथा मान्यताओ के अनुसार व्यवहार करता है तो लोग उसकी प्रशंसा करते है | साथ ही वह समाज के हित को द्रष्टि में रखते हुए जब कोई विशिष्ट व्यवहार करता है, तो उसे पुरस्कार भी मिलता है | इसके विपरीत जब बालक असामाजिक व्यवहार करता है, तो दण्ड दिया जाता है जिसके भी से वह ऐसा कार्य फिर दोबारा नही करता | स्पष्ट है पुरस्कार एवं दण्ड का बालक के समाजीकरण पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है |

बालको का समाजीकरण करने वाले अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य/CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

बालक जन्म के समय कोरा पशु होता है | जैसे-जैसे वह समाज के अन्य व्यक्तियों तथा समाजिक संस्थाओ के सम्पर्क में आकार विभिन्न प्रकार की समाजिक क्रियाओ में भाग लेता रहता है वैसे-वैसे वह अपनी पाश्विक प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण करते हुए समाजिक आदर्शो तथा मूल्यों को सीखता रहता है | इस प्रकार बलके के समाजीकरण की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है | बालक के समाजीकरण में उसका परिवार, पडोस, स्कूल, उसके साथी, उसका समुदाय, धर्म, इत्यादि का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है |

परिवार :- बालक के विभिन्न तत्वों में परिवार का प्रमुख स्थान है | इसका कारण यह है की प्रत्येक बालक का जन्म किसी न किसी परिवार में ही होता है | जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है वैसे-वैसे वह अपने माता-पिता भाई-बहनों तथा परिवार के अन्य सदस्यों के सम्पर्क में आते हुए प्रेम, सहानुभूति, सहनशीलता तथा सहयोग आदि अनेक सामाजिक गुणों को सीखता रहता है | यही नही, वह अपने परिवार में रहते हुए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने परिवार के आदर्शो, मूल्यों, रीती-रिवाजो, परम्पराओ तथा मान्यताओ एवं विश्वासों को भी शनै:- शनै: सीख जाता है |

पडोस :- पडोस भी एक प्रकार का बड़ा परिवार होता है | जिस प्रकार बालक परिवार के विभिन्न सदस्यों के साथ अन्त: क्रिया द्वारा अपनी संस्कृति एवं सामाजिक गुणों का ज्ञान प्राप्त करता है, ठीक उसी प्रकार वह पडोस में रहने वाले विभिन्न सदस्यों एवं बालको के सम्पर्क में रहते हुए विभिन्न सामाजिक बातो का ज्ञान प्राप्त करता रहता है | इस द्रष्टि से यदि पडोस अच्छा है तो उसका बालक के व्यक्तित्व के विकास पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और यदि पडोस खराब है तो बालक के बिगड़ने की सम्भावना है | यही कारण है की अच्छे परिवारों के लोग अच्छे पडोस में ही रहना पसंद करते है ?

स्कूल :- परिवार तथा पडोस के बाद स्कूल एक ऐसा स्थान है जहाँ पर बालक का समाजीकरण होता है | स्कूल के विभिन्न परिवारों के बालक शिक्षा प्राप्त करने आते है | बालक इन विभिन्न परिवारों के बालक तथा शिक्षको के बीच रहते हुए सामाजिक प्रतिक्रिया करता है जिससे उसका समाजीकरण तीव्रगति से होने लगता है | स्कूल में रहते हुए बालक को जहाँ एक और विभिन्न विषयों की प्रत्यक्ष शिक्षा द्वारा सामाजिक नियमो, रीती-रिवाजो, परम्पराओ, मान्यताओ, विश्वासी तथा आदर्शो एवं मूल्यों का ज्ञान होता है वहाँ दूसरी और उसमे स्कूल की विभिन्न सामाजिक योजनाओ में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न सामाजिक गुणों का विकास होता रहता है | इस द्रष्टि से परिवार तथा पडोस की भांति स्कूल भी बालक के समाजीकरण का मुख्य साधन है |

बालक के साथी :- प्रत्येक बालक अपने साथियो के साथ खेलता है | वह खेलते समय जाती-पाँति, ऊँच-नीच था अन्य प्रकार के भेदभावो से उपर उठकर दुसरे बालको के साथ अन्त-क्रिया द्वारा आनन्द लेना चाहता है | इस कार्य में उसके साथी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते है |

समुदाय :- बालक के समाजीकरण में समुदाय अथवा समाज का गहरा प्रभाव होता है | प्रत्येक समाज अथवा समुदाय अपने-अपने विभिन्न साधनों तथा विधियों के द्वारा बालक का समाजीकरण करना अपना परम कर्तव्य समझता है | इन साधनों के अन्तर्गत जातीय तथा राष्ट्रिय प्रथाएँ एवं परम्पराएँ, मनोरंजन एवं राजनितिक विचारधाराए, धार्मिक कट्टरता, संस्कृति कला, साहित्य, इतिहास, जातीय पूर्वधारणाएँ, इत्यादि आती है |

धर्म :- धर्म का बालक के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान है | हम देखते है की प्रत्येक धर्म के कुछ संस्कार, परम्पराएँ, आदर्श तथा मूल्य होते है | जैसे-जैसे बालक अपने धर्म अथवा अन्य धर्मो के व्यक्तित्व एवं समूहों के सम्पर्क में आता जाता है, वैसे-वैसे वह उक्त सभी बातो का स्वाभाविक रूप से सीखता है |

समाजीकरण में अध्यापक की भूमिका/CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

अध्यापक भी बच्चे के व्यक्तिगत व सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | स्कूल शिक्षा का एक औपचारिक साधन है तथा क्रमबद्ध रूप से बच्चे के समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करता है | वास्तव में स्कूल बच्चे को वहाँ से उठाता है जहाँ से उसका परिवार उसे छोड़ता है | अध्यापक शिक्षा के द्वारा बच्चे सहयोग, अनुशासन, सामूहिक कार्य आदि सीखते है | इस प्रकार स्कूल बच्चे में आधारभूत सामाजिक व्यवहार तथा व्यवहार के सिद्धान्तों की नींव डालता है | इसके साथ शिक्षक के स्नेह, पक्षपात, अच्छे बुरे व्यवहार आदि का बच्चो पर प्रभाव पड़ता है | वह कक्षा और खेल के मैदान में, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक क्रियाओ में बालको के सामने सामाजिक व्यवहार के आदर्श प्रस्तुत करता है | बालक अपने अनुकरण की मूल परवृत्ति के कारण शिक्षको के कार्यो, आदतों और रीतियों का अनुकरण करता है | अत: यह अध्यापक का कर्तव्य बन जाता है की वह बच्चो के सामने आदर्श प्रस्तुत करे क्योकि अध्यापक के कथनों तथा कार्यो की छाप बालक पर लग जाती है | समाजीकरण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए शिक्षक निम्न कदम उठा सकता है |

1. उसे समय-समय पर अभिभावकों से सम्पर्क स्थापित करना चाहिये तथा मिल-जुलकर बच्चे के विकास के सम्बन्ध में सोचना चाहिये तथा कार्य करना चाहिये |

2. बच्चे को सामाजिक संस्कृति व समाज में प्रचलित मान्यताओ का ज्ञान देना चाहिये |

3. बालको/छात्रों के सामने सामाजिक आदर्श स्थापित करना चाहिये |

4. बालको/छात्रों को स्कूल की परम्पराओ से परिचित करवाना चाहिए |

5. विभिन्न सामाजिक योजनाओ तथा सामूहिक क्रियाओ में भाग लेने के लिए बच्चो को प्रोत्साहित करना चाहिये |

6. स्कूल में विभिन्न परिवारों से बच्चे आते है, उनकी संस्कृति भी भिन्न-भिन्न होती है | अत: अध्यापक को बच्चो में अन्त: सांस्कृतिक भावना का विकास करना चाहिये |

7. अध्यापक को सहयोगियों, छात्रों तथा प्रधानाचार्य के साथ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने चाहिए |

8. बालको के साथ स्नेह तथा सहानुभूति का बर्ताव करना चाहिए |

इस प्रकार अध्यापक बच्चो के व्यक्तिगत व सामाजिक सम्बन्धो के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है |

बच्चे के समाजीकरण में माँ-बाप की भूमिका/CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

समाजीकरण करने वाली संस्था के रूप में परिवार व माँ-बाप का महत्त्व वास्तव में असाधारण है | यह कहा जाता है की माँ के त्याग और पिता की सुरक्षा में रहते हुए बच्चा जो कुछ सीखता है, वह उसके जीवन की स्थायी पूँजी होती है | परिवार या घर को सभी सामाजिक इकाई होती है | यह परिवार ही होता है जहाँ से बच्चा सामाजिक जीवन की शुरुआत करता है |

बच्चा सबसे पहले परिवार में जन्म लेकर परिवार का सदस्य बनता है | उसका सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध अपनी माँ से होता है | माँ उसे दूध पिलाती है और तरह-तरह से उसकी रक्षा करती है | बच्चे को नियमित रूप से खाने-पीने की, पहनने की तथा रहने की सीख मिलती है | इससे बच्चे के मन में एक सुरक्षा की भावना पनपती है जो उसके जीवन को स्थिर तथा दृढ़ बनाती है और आगे चलकर उसे उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायता देती है |

माँ और बाप से बच्चे की अधिकतर आवश्यकताएँ पूरी होती है | साथ ही बच्चा यह देखता है की कुछ कार्यो को करने पर माँ या पिता उसे प्यार करते है, उसकी प्रसंशा करते है और कुछ कार्यो के करने से उसे दण्ड मिलता है, उसकी निन्दा होती है | परिवार से ही बच्चे को सर्वप्रथम यह ज्ञान होता है की उसे कौन-कौन से काम करने चाहिये और किन-किन कार्यो से बचना चाहिये | इससे बच्चा धीरे-धीरे सीख जाता है की समाज में क्या अच्छा है और क्या बुरा और समाज उससे क्या चाहता है | धीरे-धीरे वह उन भावनाओ, मान्यताओ, परम्पराओ और नियमो को भी जान लेता है जो समाज में प्रचलित होते है तथा समाज को मान्य होते है |

माँ अपने बच्चे को प्यार करती है, परिवार के अन्य लोग भी उसे प्यार करते है | वे उसके साथ हँसते-बोलते है | बच्चा उनकी तरफ देखता है, उनके होठो को हिलाकर बाते करने की प्रक्रिया को बार-बार देखता है और फिर उसी की नकल उतारने का प्रयास करता है | इसी के परिणामस्वरूप भाषा का विकास होता है | बच्चा परिवार में गुड्डे-गुडिया का खेल खेलता है | गुडिया के साथ वह उसी प्रकार का व्यवहार करता है जैसे माँ या बाप उसके साथ करते है | वह उन्ही की तरह उसे सुलता, खिलाता-पिलाता यहाँ तक की मरता पिटता तक है | इन सब क्रियाओ के माध्यम से बच्चे को दूसरो के साथ व्यवहार करने तथा एक विशिष्ट पद (status) के अनुसार काम करने की कला का ज्ञान होता है | यह एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक गुण है जो समाजीकरण की प्रक्रिया में बच्चे को अपने परिवार से प्राप्त होता है |

परिवार के प्राय: एक से अधिक सदस्य होते है | इनमे से प्रत्येक के अलग-अलग मिजाज, रूचि, व्यवहार के तरीके, भावनाएँ आदि होती है | फिर भी इनमे से प्रत्येक के साथ बच्चे को घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करना होता है क्योकि परिवार के साथ रहता, बोलता व खेलता है | इस प्रक्रिया के दौरान वह यह सीख जाता है, की दूसरो से किस प्रकार अनुकूलन किया जा सकता है | इस अनुकूलन के दौरान उसमे सहनशीलता का गुण भी पनप जाता है |

परिवार में रहकर ही बच्चा माँ-बाप से सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ, क्षमा का महत्त्व और सहयोग की आवश्यकता सीखता है और अपनी मौलिक धारणाओं, आदर्श और शैली की रचना करता है | बच्चे में ‘हम’ की भावना पैदा होती है | यदि घर में माँ-बाप सहयोग से रहते है, एक दुसरे का साथ पसंद करते है, तो बच्चे में भी सहयोग की भावना पनपती है | बच्चो में पनपी यह भावना बाहरी समाज के व्यवहार में भी झलकती है |

माँ-बाप की सामाजिक प्रतिष्ठा व घर का आर्थिक स्तर भी बच्चे के समाजीकरण का एक मुख्य कारक है | सम्पन्न घरो के बच्चो में अधिकतर अपने को श्रेष्ठ मानने की भावना होती है | वे अधिकतर चुस्त, स्वस्थ व बोलने में व्यवहारकुशल होते है | गरीब बच्चो के बच्चे में निर्धनता के कारण हीन भावना होती है | इसलिए उनके सामाजिक समायोजन में भी कठिनाई आती है | इस प्रकार यह कहा जा सकता है की घर बच्चे के समाजीकरण का मुख्य साधन है | अच्छे परिवार के बच्चे अधिकतर सुसंकृत व सभ्य बनते है | बुरे परिवार के बच्चे अधिकतर झगडालू असभ्य व समस्या बनते है |

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समाजीकरण में खेल की भूमिका/CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi

जिस प्रकार कवि अपने आपको कविता लिखने तथा गायक गाने से नही रोक सकता, उसी प्रकार बालक अपने आपको खेलने से नही रोक सकता | खेल को बच्चे की रचनात्मक, जन्मजात, स्वतन्त्र, आत्मप्रेरित, स्फूर्तिदायक, स्व्लाक्षित तथा आनंददायक प्रवृत्ति कहा जाता है | खेल क्रियाओ द्वारा बालक को आत्माभिव्यक्ति का अवसर मिलता है | इसलिए खेल का बच्चे के समाजीकरण में विशेष स्थान है |

अधिकांश खेलो में मुख्यतः साथियो की आवश्यकता होती है, इसलिए उनका स्वभाव मुख्यतः सामाजिक होता है | इसलिए खेल क्रियाओ द्वारा बच्चे में सामाजिक द्रष्टिकोण का विकास होता है | अन्य बच्चो के साथ खेलने में बच्चे अपरिचित लोगो से सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करना तथा उन सम्बन्धो से अपनाएं जाने या उसमे लोकप्रिय होने पर बच्चे में सुरक्षा की भावना आती है जो समाजीकरण के लिए बहुत आवश्यक है | सामूहिक खेलो से आदान-प्रदान की भावना का विकास होता है | कई खेल क्रियाओ में बच्चे अपने खिलौनों को दूसरो के साथ मिल-बाँट कर खेलते है तथा अपने साथियो को भी ध्यान में रखते हुए, अपनी इच्छाओं को टालना या उन पर नियन्त्रण पाना सीख लेते है | जो बच्चे दुसरे बच्चो के खिलौने छिनकर स्वयं खेलते है, उन्हें शीघ्र ही यह पता चल जाता है की उनके इस प्रकार के व्यवहार से दुसरे बच्चे उनके साथ खेलना पसंद नही करते | इससे अपने स्वार्थ को त्यागकर सबके साथ मिल-जुल कर खेलते है | इससे उनमे एकता व सहयोग की भावना पनपती है |

यही मिल-जुल कर खेलने की भावना आगे चलकर मिल-जुलकर रहने की भावना में बदल जाती है | यही नही, झुमूठ के काल्पनिक खेलो, जैसे-अध्यापक अथवा माँ-बाप की भूमिका निभाना आदि के माध्यम से बडो के प्रति जो कुछ भी उसमे शत्रुता का भावना होती है काफी कम हो जाती है | खेल बच्चे एक नेता के नेत्रत्व में खेलते है | इससे उनमे नेत्र्तव व अनुसरण की भावना पैदा पैदा हो जाती है | बच्चे एक-दुसरे की भावनाओ का आदर करना सीख जाते है | दुसरो के वे गुण जो औरो द्वारा सराहे जाते है, जिनके कारण वे नेता कहलाएँ जाते है, बच्चो में उन गुणों को अपनाने की इच्छा जागृत हो जाती है | खेल में सब बच्चे नेता के कहने के अनुसार चलते है | इसमें समूह के नियमो को मानना आवश्यक हो जाता है | इससे बच्चे अनुशासन में रहना सीखते है | यही अनुशासन उनकी आगे की जिन्दगी में उन्हें अनुशासनप्रिय बनने की प्रेरणा देता है | समूह में खेलने के कारण बच्चे में ‘हम’ की भावना पैदा होती है | खेल में बच्चा यह कभी नही कहता की ‘मै जीतूँगा’ | वह हमेशा यही कहता है की ‘हम’ जीतेंगे |यह भावना बच्चे के समाजीकरण में बहुत सहायक सिद्ध होती है | इससे बच्चे दूसरो के लिए काम करना सीख जाते है | खेल में हार व जीत दोनों ही होते है |

CTET UPTET Socialization Process Study Material in Hindi :- Practice Set for UP Teacehrs

बच्चे जीत से तो प्रेरित होते है लेकिन व हार को भी स्वीकार करना सीख लेते है | इससे बच्चो में दूसरो के गुणों को स्वीकारना, उनकी प्रशंसा करना तथा हार को सहन करना आता है | इससे बच्चो में प्रेरणा के साथ-साथ सहनशक्ति भी बढ़ती है जो समाज में रहने के लिए बहुत जरूरी है | यह देखा गया है की जिन बच्चो को खेल के अवसर नही मिलते या बहुत कम मिलते है, उन्हें दुसरे बच्चो के साथ समायोजन स्थापित करने में बहुत कठिनाई होती है | ऐसे बच्चे अकसर स्वकेन्द्रित हो जाते है तथा संवेदनहीन व दूसरो पर संदेह करने वाले भी होते है | इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ समाजीकरण में तो बाधा डालती है, बच्चे के संवेगात्मक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है | इसलिए बच्चे के सामाजिक, शारीरिक व संवेगात्मक विकास के लिए उसका विभिन्न खेलो में भाग लेना बहुत आवश्यक है |

समाजीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान करने के लिए शिक्षक का सर्वप्रथम कार्य यह है की वह बालक के माता-पिता से सम्पर्क स्थापित करके उसकी रुचियों तथा मनोवृत्तियों के विषय में ज्ञान प्राप्त करे एवं उन्ही के अनुसार उसे विकसित होने के अवसर प्रदान करे | शिक्षक को चाहिये की वह स्कूल में विभिन्न सामाजिक योजनाओ के द्वारा बालको को सामूहिक क्रियाओ में सक्रिय रूप से भाग लेने से उसका समाजीकरण स्वत: हो जायेगा | बालक के समाजीकरण में स्वस्थ मानवीय सम्बन्धो का गहरा प्रभाव पड़ता है | अत: शिक्षक को चाहिये की वह दुसरे बालको, शिक्षको तथा स्कूल के प्रधानाचार्य के साथ स्वस्थ मानवीय सम्बन्ध स्थापित करे | इन स्वस्थ मानवीय सम्बन्धो के स्थापित हो जाने से स्कूल का समस्त वातावरण सामाजिक बन जायेगा |

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