UPTET 2017 Principles of Child Devlelopment Study Material in Hindi

UPTET 2017 Principles of Child Devlelopment Study Material in Hindi

UPTET 2017 Principles of Child Devlelopment Study Material in Hindi : सामान्य बालक अभिवृद्धि तथा विकास की दिशा में अग्रसर होता हुआ एक प्राणी है | समय के साथ उसमे बहुत से गुणात्मक तथा परिमाणात्मक परिवर्तन आते है जिनका सम्मिलित नाम विकास कहलाता है | धीरे-धीरे उसकी लम्बाई, भार, क्रियात्मक क्रियाओ, प्रत्यक्षीकरण, संवेगात्मक नियन्त्रण, सामाजिक समायोजन, भाषा योग्यता इत्यादि का एक नियमित प्रतिरूप के अनुसार अभिवृद्धि तथा विकास होता रहता है |

बाल विकास के सिद्धान्त (Principles of Child Development)

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इस विकास का ज्ञान शिक्षको को अपने शिक्षण कार्य को अधिक प्रभावशाली बनाने में काफी सहायक हो सकता है | किसी निश्चित आयु के बालको के पाठ्यक्रम सम्बन्धी क्रियाओ को नियोजित करते समय शिक्षक को यह जानना आवश्यक हो जाता है की उस आयु के बालको में सामन्यत: किस प्रकार की शारीरिक व मानसिक क्षमता है, उन्हें किस किस पराक्र की शारीरिक व मानसिक क्षमता है, उन्हें किस प्रकार की सामाजिक क्रियाओ , में लगाया जा सकता है तथा वे अपने संवेगों पर कितना नियन्त्रण रख सकते है |

शिक्षक को उस आयु के सामन्य बालको के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तथा संवेगात्मक परिपक्वता के स्तर का ज्ञान होना आवश्यक है, जिससे वह उनकी क्रियाओ को नियन्त्रित करके उन्हें अपेक्षित दिशा प्रदान कर सके |

UPTET बाल विकास के सिद्धान्त

विकास की प्रक्रिया निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है | यह जन्म से लेकर मृत्यु-प्रयत्न चलती है | विकास की एक निश्चित दिशा होती है | यह सामन्य से विशेष की और बढ़ता है | यह विकास अनियमित रूप से व आकस्मिक ढंग से नही होता है बल्कि क्रमबद्ध, धीरे-धीरे व निश्चित समय पर होता है | यधापी विकास की गति व्यक्तिगत भिन्नता पर भी निर्भर करती है लेकिन कुछ ऐसे सर्वमान्य सिद्धान्त है जो विकास के हर क्षेत्र पर लागू होते है | विकास के कुछ मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित है-

निरन्तरता का सिद्धान्त :- इस सिद्धान्त के अनुसार विकास एक न रुकने वाली प्रक्रिया है | माँ के गर्भ से ही यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और म्रत्यु\पर्यन्त चलती रहती है | एक छोटे से नगण्य आकार से अपना जीवन प्रारम्भ करके हम सबके व्यक्तित्व के सभी पक्षी – शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि का सम्पूर्ण विकास इसी निरन्तरता के गुण के कारण भली-भांति सम्पन्न होता रहता है |

वैयक्तिक अन्तर का सिद्धान्त :- इस सिद्धान्त के अनुसार बालको का विकास और वृद्धि उनकी अपनी वैयक्तिकता के अनुरूप होती है | वे अपनी स्वाभाविक गति से ही वृद्धि और विकास के विभिन्न क्षेत्रो में आगे बढ़ते रहते है और इसी कारण उनमे पर्याप्त विभिन्नताएँ देखने को मिलती है | कोई भी एक बालक वृद्धि और विकास की द्रष्टि से किसी अन्य बालक के समरूप नही होता | विकास के इसी सिद्धान्त के कारण कोई बालक अत्यन्त मेधावी, कोई बालक समान्य तथा कोई बालक पिछड़ा मन्द होता है |

विकास क्रम की एकरूपता :- यह सिद्धान्त बताता है की विकास की गति एक जैसी न होने तथा पर्याप्त वैयक्तिक अन्तर पाए जाने पर भी विकास क्रम में एक ही जाती विशेष के सभी दर्शन होते है | इस क्रम में एक ही जाती विशेष के सभी सदस्यों में कुछ एक जैसी विशेषताएं देखने को मिलती है | उदाहरण के लिए मनुष्य जाती के सभी बालको की वृद्धि सर की और से प्रारम्भ होती है | इसी तरह बालको के गत्यात्मक और भाषायी विकास में भी एक निश्चित प्रतिमान और क्रम के दर्शन किये जा सकते है |

वृद्धि एवं विकास की गति की दर एक-सी नही रहती:- विकास की प्रक्रिया जीवनपर्यन्त चलती तो है, किन्तु इस प्रक्रिया में विकास की गति हमेशा एक जैसी नही होती | शैशवावस्था के शुरू के वर्षो में यह गति कुछ तीव्र होती है, परन्तु बाद के वर्षो में यह मन्द पड़ जाती है | पुन: किशोरावस्था के प्रारम्भ में इस गति में तेजी से वृद्धि होती है, परन्तु यह अधिक समय तक नही बनी रहती | इस प्रकार वृद्धि और विकास की गति में उतार-चढ़ाव आते ही रहते है | किसी भी अवस्था में यह एक जैसी नही रह पाती |

विकास समान्य से विशेष की और चलता है :- विकास और की सभी दशाओं में विशिष्ट क्रियाओ से पहले उनके सामान्य रूप के दर्शन होते है | उदाहरण के लिए अपने हाथो से कुछ चीज पकड़ने से पहले बालक इधर से उधर यूँ ही हाथ मारने या फ़ैलाने की चेष्टा करता है | इसी तरह शुरू में एक नवजात शिशु के रोने और चिल्लाने में उसके सभी अंग प्रत्यंग भाग लेते है, परन्तु बाद में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया के फलस्वरूप यह क्रियाएँ उसकी आँखों और वाक्तन्त्र तक सीमित हो जाती है | भाषा विकास में भी बालक विशेष शब्दों से पहले सामान्य शब्द ही सीखता है | पहले वह सभी व्यक्तियों को ‘पापा’ कहकर ही सम्बोधित करता है, इसके पश्चात् ही वह केवल अपने पिता को ‘पापा’ कहकर सम्बोधित करना सीखता है |

परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त :- विकास के सभी आयाम, जैसे-शारीरिक, मानसिक, समाजिक, संवेगात्मक आदि एक दुसरे से परस्पर सम्बन्धित है | इनमे से किसी भी एक आयाम में होइने वाला विकास अन्य सभी आयामों में होने वाले विकास को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखता है | उदाहरण के लिए जिन, बच्चो में औसत से अधिक वृद्धि होती है, वे शारीरिक और समाजिक विकास की द्रष्टि से भी काफी आगे बढ़ते हुए पाए जाते है | दूसरी और, एक क्षेत्र में पाई जाने वाली न्यूनता दुसरे क्षेत्र में हो रही पगति में बाधक सिद्ध होती है | यही कारण है की शारीरिक विकास की द्रष्टि से पिछड़े बालक संवेगात्मक, सामाजिक एवं बौद्धिक विकास में भी उतने ही पीछे रह जाते है |

एकीकरण का सिद्धान्त :- विकास की प्रक्रिया एकीकरण के सिद्धान्त का पालन करती है | इसके अनुसार, बालक पहले सम्पूर्ण अंग को और फिर अंग के भागो को चलाना सीखता है | इसके बाद वह उन भागो में एकीकरण करना सीखता है | सामान्य से विशेष की और बढ़ते हुए विशेष प्रतिक्रियाओ तथा चेष्टाओ को इकट्ठे रूप में लाना सीखता है |उदाहरण के लिए, एक बालक पहले पुरे हाथ को, फिर अंगुलियो को और फिर हाथ एवं उंगलियो को एक साथ चलाना सीखता है |

विकास की भविष्यवाणी की जा सकती है :- किसी बालक में उसकी वृद्धि और विकास की गति को ध्यान में रखकर उसके आगे बढ़ने की दिशा और स्वरूप के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है | उदाहरण के लिए, एक बालक की कलाई की हड्डियों का एक्स किरणों से लिया जाने वाला चित्र यह बता सकता है की उसका आकार-प्रकार आगे जाकर किस प्रकार का होगा | इसी तरह बालक की इस समय की मानसिक योग्यताओ के ज्ञान के सहारे उसके आगे मानसिक विकास के बारे में पुर्वानुमान लगाया जा सकता है |

विकास की दिशा का सिद्धान्त :- इस सिद्धान्त के अनुसार, विकास की प्रक्रिया पूर्व निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है | विकास की प्रक्रिया की यह दिशा व्यक्ति के वंशानुगत एवं वातवरणजन्य कारको से प्रभावित होती है | इसके अनुसार बालक सबसे पहले अपने सर और भुजाओं की गति पर नियन्त्रण करना सीखता है और उसके बाद फिर टांगो को | इसके बाद ही वह अच्छी तरह बिन सहारे के खड़ा होता और चलना सीखता है |

विकास लम्बत न होकर वर्तुलाकार होता हैप्रत्युक्त : बालक का विकास लम्बत सीधा न होकर वर्तुलाकार होता है | वह एक-सी गति से सीधा चलकर विकास को विकास को प्राप्त नही होता, बल्कि बढ़ते हुए पीछे हटकर अपने विकासको परिपक्व और स्थाई बनाते हुए वर्तुलाकार आकृति की तरह आगे बढ़ता है | किसी एक अवस्था में वह तेजी से आगे बढ़ते हुए उसी गति आगे नही जाता, बल्कि अपनी विकास की गति को धीमा करते हुए वर्षो विश्राम लेता हुआ प्रतीत होता है ताकि प्राप्त वृद्धि और विकास को स्थाई रूप दिया जा सके | यह सब करने के पश्चात ही वह आगामी वर्षो में फिर कुछ आगे बढ़ने की चेष्टा कर सकता है |

वृद्धि और विकास की किया वंशानुक्रम और वातावरण का संयुक्त परिणाम है :- बालक की वृद्धि और विकास की किसी स्तर पर वंशानुक्रम और वातावरण की संयुक्त देन माना जाता है |दुसरे शब्दों में, वृद्धि और विकास की प्रक्रिया में वंशानुक्रम जहाँ आधार का कार्य करता है वहाँ वातावरण इस आधार पर बनाए जाने वाले व्यक्तित्व सम्बन्धी भवन के लिए अत: वृद्धि और विकास की प्रक्रियाओ में इन दोनों को समान महत्त्व दिया जाना आवश्यक हो जाता है |

बाल विकास से सम्बन्धित अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त पुनर्बलन सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक डोलार्ड और मिलर (zjohn Dollard & Neal Miler) है | इनके अनुसार बच्चे का जैसे-जैसे विकास होता है, अधिगम करता जाता है | इन्होने बाल्यावस्था के अनुभवो को व्यस्क व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण कारको के रूप में स्वीकार किया है | इन्होने अचेतन कारको के अतिरिक्त चिन्तन और अधिगमित भय को व्यक्तित्व गतिशीलता में बहुत अधिक महत्त्व दिया है |

इनके अनुसार भोजन, पानी, ओक्सीजन और ताप कुछ अर्जित व्यवहार पूर्णत: पर्याप्त नही होता है अत: बालक को अधिक जटिल व्यवहार का अधिगम इन आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए करना होता है; उदाहरण के लिए, नवजात शिशु का स्तनपान से सम्बन्धित अर्जित व्यवहार उसकी भोजन की आवश्यकता के लिए अधिक समय तक पर्याप्त नही होता है, उसे भूख की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ अधिक स्तनपान के जटिल व्यवहारों को सीखना होता है | इनके अनुसार अधिगम के चार महत्त्वपूर्ण अवयव है-अन्तनोंद (अभिप्रेरण), संकेत (उद्दीपक), (स्वयं का व्यवहार) तथा पुनर्बलन (पुरस्कार) |

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UPTET सामाजिक अधिगम सिद्धान्त

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक बन्दुरा और वाल्टर्स ने सामाजिक अधिगम के महत्त्व की पुष्टि अनेक प्रयोगात्मक अध्ययनो के आधार पर की है, बन्दुरा ने एक प्रयोग में बच्चो को एक फिल्म दिखाई जिसमे एक व्यस्क व्यक्ति के व्यवहार को प्रदर्शित किया गया था, फिल्म के तीन भाग थे, प्रत्येक बच्चे को केवल एक प्रकार की फिल्म दिखाई गयी | पहली फिल्म में फिल्म का हीरो आक्रामक व्यवहार प्रदर्शित करता था और इस व्यवहार के लिए उसे दण्ड दिया जाता था | दूसरी फिल्म में हीरो आक्रामक व्यवहार करता था और अपने इस आक्रमक व्यवहार के लिए पुरस्कृत होता था |

तीसरा फिल्म में आक्रमक व्यवहार के लिए हीरो को न ही पुरस्कृत किया जाता था और न ही दण्डित किया जाता था फिल्म को प्रत्येक बच्चे को दिखाने के बाद प्रत्येक बच्चे को उन्ही परिस्तिथियो में रखा गया जिन परिस्तिथियो से सम्बन्धित उन्हें फिल्म दिखाई गयी थी | इन परिस्तिथियो में रखकर बच्चो के व्यवहार का अनुकरण अपेक्षाकृत कम किया जो हीरो के आक्रमक व्यवहार और दण्ड से सम्बन्धित था | सामाजिक अधिगम सिद्धान्त में व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारको में केवल वातावरण सम्बन्धी कारको कको ही महत्त्व दिया है, वंशानुक्रम कारको को कोई महत्त्व नही दिया गया है |

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