CTET UPTET Theory of Piaget Kohlberg Vygotsky Study Material in Hindi
CTET UPTET Theory of Piaget Kohlberg Vygotsky Study Material in Hindi : CTET UPTET 2018 and 2019 Paper 1 Study Material in Hindi Online Practice Set free Online Question answer Download.

पियाजे, कोहलबर्ग व्यगोटस्की के सिद्धान्त Theory of Piaget, Kohlberg and Vygotsky
मानव विकास की वृद्धि एवं विकास के कई आयाम होते है | विकास की विभिन्न अवस्था में बालक में विशेष प्रकार के गुण एवं विशेषताएँ देखने को मिलती है | इनका अध्ययन कर कई मनोवैज्ञानिको ने विकास की अवस्थाओ के सन्दर्भ में विभिन्न प्रकार के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है | विकास की अवस्थाओ में
सम्बन्धित इन सिद्धान्तों में जिन पियाजे, लारेन्स कोहलबर्ग एवं व्यगोटस्की नामक मनोवैज्ञानिक द्वारा प्रदत्त सिद्धान्तों विशेष रूप से उल्लेखनीय है |
CTET UPTET Theory of Piaget Kohlberg Vygotsky Study Material 2018 in Hindi (जीन पियाजे के विकास की अवस्थाओ का सिद्धान्त)
जीन पियाजे स्विट्जरलैंड के एक मनोवैज्ञानिक थे | बालको में बुद्धि का विकास किस ढंग से होता है, अपनी खोज का विषय बनाया |
पियाजे :- के अध्ययनों का आधुनिक बालविकास विषय पर अधिक प्रभाव पड़ा है | उसने मनोवैज्ञानिको का ध्यान विकास की अवस्थाओ की और तथा संज्ञान
के महत्त्व की और आकर्षित किया है | पियाजे के सिद्धान्त के कुछ प्रमुख विचार निम्न प्रकार है |
1. निर्माण और खोज (CTET UPTET 2018 Exam Important Study Material in Pdf Downlaod
प्रत्येक बालक अपने अनुभवो को अर्थपूर्ण बनाने के लिए क्रियाशील होता है | वह यह जानने के लिए प्रयत्नशील होता है की उसके विचार सम्बद्धतापूर्ण से मेल खाते है या नही | बच्चे उन व्यवहारों और विचारो की समय-समय पर खोज और निर्माण करते है, जिन व्यवहारों और विचारो का उन्होंने कभी पहले प्रत्यक्ष नही किया होता है | पियाजे का विचार है की, ज्ञानात्मक विकास केवल नकल न होकर खोज पर आधारित है | नवीनता या खोज को उददीपक-अनुक्रिया सामान्यीकरण के आधार पर नही समझाया जा सकता है, उदाहरण के लिए, एक चार साल का बालक यदि भिन्न-भिन्न आकार के प्यालो को प्रथम बार
क्रमानुसार लगा देता है, तो यह उसके बौद्धिक वृद्धि की खोज और निर्माण से सम्बन्धित है |
2. कार्य-क्रिया का अर्जन (CTET UPTET Exam 2018 2019 Study Material Question Paper in Hindi
कार्यात्मक-क्रिया का तात्पर्य-उस विशिष्ट प्रकार की मानसिक दिनचर्या से है, जिसकी मुख्य विशेषता उत्क्रमणशीलता है | प्रत्येक कार्यात्मक-क्रिया का एक तर्कपूर्ण विपरीत होता है, उदहारण के लिए, एक मिटटी के चक्र को दो भागो में तोडना तथा दो टूटे हुए भागो को पुन: एक पूर्ण चक्र के रूप में जोड़ना एक
कार्यात्मक क्रिया है | कार्यात्मक-क्रिया की सहायता से बच्चे मानसिक रूप से वहाँ पुन: पहुँच सकते है जहाँ से उन्होंने कार्य प्रारम्भ किया था | बौद्धिक वृद्धि का केन्द्र इन्ही कार्यात्मक-क्रिया का अर्जन है | पियाजे का विचार है की, जब तक बालक किशोर अवस्था में तक नही पहुँच जाता है तब तक वह भिन्न-भिन्न
विकास अवस्थाओ में भिन्न-भिन्न वर्गो के कार्यात्मक-क्रिया का अर्जन करता रहता है | एक विकास अवस्था से दूसरी में पदार्पण के लिए निम्न दो तथ्य
आवश्यक है
(i) सात्मिकरण :- सात्मिकरण का अर्थ है-बालक में उस्थित एक विचार में किसी नए विचार या वस्तु का समावेश हो जाना | पियाजे का विचार है की सात्मिकरण बालक के प्रत्यक्षात्मक-गत्यात्मक समन्वय से सम्बन्धित है | प्रत्येक बालक में प्रत्येक आयु स्तर पर कुछ न कुछ क्रियाओ या कार्यात्मक-क्रिया के
समूह विधमान होते है | इन पुरानी कार्यात्मक-क्रिया में नए विचार या क्रियाओ का समावेश हो जाता है | अत: सात्मिकरण का अभिप्राय पुराने विचारो और आदतों को नयी वस्तुओ में प्रयुक्त करना है तथा घटनाओ को, वर्तमान विचारो को, एक भाग के रूप में समझना है |
(ii) व्यवस्थापन तथा सन्तुलन स्थापित करना :- व्यवस्थापन का अर्थ नई वस्तु या विचार के साथ समायोजन करना है या अपने विचारो और क्रियाओ को नई विचारो और वस्तुओ में फिट करना है | बालको में बौद्धिक विवृद्धि जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे वह नई परिस्थितियों के साथ समायोजन करना सीखता है | मानसिक वृद्धि में सात्मिकरण और व्यवस्थापन में उपस्थित अथवा उत्पन्न तनाव का हल निहित होता है | यह तनाव नई परिस्थितियों में पुरानी अनुक्रियाओ के प्रयोग के समय उत्पन्न होते है या उस समय उत्पन्न होते है जबकि बालक नई अनुक्रियाओ को न्यिऊ समस्याओ के समाधान में फिट करता है | बालक हर समय नई घटनाओ या समस्याओ के साथ अपने को व्यवस्थापित करता रहता है, जिससे उसका बौद्धिक विकास परिपक्वता की और अग्रसर होता है | इस प्रकार का व्यवस्थापन सन्तुलन कहलाता है |
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3. क्रमिक विकासत्मक अवस्थाएँ (CTET UPTET Study Material Paper 1 2018 in PDF Download
पियाजे ने विकास की चार अवस्थाओ का वर्णन किया है
(i) इन्द्रियजनित गामक अवस्था :- यह जन्म से चौबीस महीने तक की अवस्था है | इस आयु में उसकी बुद्धि उसके कार्यो द्वारा वक्त होती है, उदहारण के लिए, चादर पर बैठा बालक चादर पर पड़े दूर खिलौने को प्राप्त करने के लिए चादर को खींचकर खिलौना प्राप्त कर लेता है | पियाजे के अनुसार यह एक
बौद्धिक कार्य है |
(ii) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था :- यह दो से सात वर्ष तक की अवस्था है | इस अवस्था में वह नई सूचनाओ और अनुभवो का संग्रह करता है | वह पहली अवस्था की अपेक्षा अधिक समस्याओ का समाधान करने योग्य हो जाता है | इस अवस्था में उसमे आत्मकेंद्रितता का उदय होता है | इस अवधि के अन्त तक
जब बालक में कुछ सामाजिक विकास उन्नत हो जाता है तब उसकी यह आत्म्केन्द्रिता कुछ कम होने लग जाती है | इस अवस्था में मुख्यत: भाषा और वस्तुओ तथा घटनाओ के अर्थ का विकास होता है | इस अवस्था का वर्णन करते हुए लाइबर्ट ने लिखा है की इस अवस्था में बच्चा कुछ भौतिक संक्रियात्मक
की उत्क्रमणशीलता को देखने में असफल होता है | वह रूप परिवर्तन के स्थान पर अवस्थाओ का प्रत्यक्षीकरण करता है और वह समस्या के एक अकेले विवरण पर ध्यान केन्द्रित करता है वह समस्या के दुसरे आयाम पर अपना ध्यान केन्द्रित नही कर पाता है | यधापी पियाजे का विचार है की छ: वर्ष से कम
आयु के बालको में संज्ञानात्मक परिपक्वता का अभाव पाया जाता है | इस अभाव के कारण वह परम्परागत समस्याओ को तभी सीख पाते है जब उन्हें कुछ शिक्षण प्रशिक्षण दिए जाते है |
(iii) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था :- यह अवस्था सात से ग्यारह वर्ष तक की अवस्था अवस्था है | उस अवस्था में वह यह विस्वास करने लगता है की लम्बाई, भार अंक आदि स्थिर रहते है | वह अनेक कार्यो की मानसिक प्रतिभा प्रस्तुत कर सकता है | वह किसी पूर्व और उसके अंश के सम्बन्ध में तर्क कर सकता है
| संक्षेप में वह अपने चारो और के पर्यावरण के साथ अनुकूलन करने के लिए अनेक नियमो को सीख लेता है |
(iv) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था :- यह अवस्था ग्यारह वर्ष से प्रौढ़ावस्था तक की अवस्था है | इस अवस्था में वह परिकल्पनातम्क ढंग से समस्याओ पर विचार कर सकता है | वह अनेक संक्रियात्मक को संगठित कर उच्च स्तर के संक्रियात्मक का निर्माण कर सकता है और विभिन्न प्रकार की समस्याओ के
समाधान के लिए अमूर्त नियमो का निर्माण कर सकता है | संक्षेप में वह इस योग्य हो जाता है की वह एक समस्या विशेष का प्रत्येक सम्भल तरीके से समाधान कर सके | उपरोक्त चारो विकास-अवस्थाओ में निरन्तरता है और प्रत्येक अवस्था अपने से पहली अवस्था से सम्बन्धित तथा उस पर आश्रित है ?
लॉरेन्स कोहुलबर्ग का नैतिक विकास की अवस्था का सिद्धान्त (CTET UPTET Paper 1 Online Study Material 2018 In Hindi Downlaod
बालको में चरित्र निर्माण या नैतिक विकास के सन्दर्भ में लॉरेन्स कोहुलबर्ग ने अपने अनुसन्धानो के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला की बालको में नैतिकता या चरित्र के विकास की कुछ निश्चित एवं सार्वभौमिक स्तर अथवा अवस्थाएँ पाई जाती है | ये अवस्थाएँ या स्तर एस प्रकार है- पूर्व नैतिक स्तर (pre- moral), परम्परागत नैतिक स्तर (conventional morality level) एवं आत्म अंगीकृत नैतिक मूल्य स्तर (self accepted moral principles level) पूर्व नैतिक अवस्था या स्तर बालक 4 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक, परम्परागत नैतिक अवस्था या स्तर 10 तथा 13 वर्ष के दौरान एवं आत्म अंगीकृत नैतिक स्तर या अवस्था 13 वर्ष से प्रारम्भ होकर प्रौढ़ावस्था तक चलती है | कोहुलबर्ग द्वारा प्रदत्त इस प्रकार के वर्गीकरण को कुछ और आगेबढ़ाने का प्रयत्न किया जाए तो निम्न प्रकार के वर्गीकरण द्वारा बालको के नैतिक या चरित्रक विकास की पाँच प्रमुख स्तर या अवस्थाएँ तय की जा सकती है |
पूर्व नैतिक अवस्था :- यह अवस्था जन्म से लेकर दो वर्ष की आयु तक विधमान रहती है | इस अवस्था में बालक से किसी प्रकार की नैतिकता या चरित्रिक मूल्यों को धारण करने की बात ही नही उठती है, क्योकि इस स्तर पर उसे यह समझ नही होती की उसके ऐसा करने से किसी अन्य को नुकसान या परेशानी
होगी | क्या अच्छा है क्या बुरा, यह बात उसकी समझ से बाहर ही होती है | उसे अपनी इच्छाओ, भावनाओ तथा संवेगों पर नियन्त्रण करना नही आता और परिणामस्वरूप वह अपनी मर्जी का मालिक बनकर इच्छित व्यवहार करने की जिद पकड़ता रहता है |
स्वकेन्द्रित अवस्था :- इस अवस्था का कार्यकाल तीसरे वर्ष से शुरू होकर 6 वर्ष तक होता है | इस अवस्था के बालक की सभी व्यवहारिक क्रियाएँ अपनी वैयक्तिक आवश्यकताओ और इच्चो की पूर्ति के चारो और केन्द्रित रहती है | उसके लिए वही नैतिक होता है जो उसके स्व अर्थात् आत्म-कल्याण से जुदा होता
है |
परम्पराओ को धारण करने वाली अवस्था :- सातवें वर्ष से लेकर किशोरावस्था के प्रारम्भिक काल का सम्बन्ध इस अवस्था से है | इस अवस्था का बालक सामाजिकता के गुणों को धारण करता हुआ देखा जाता है अत: उसमे समाज के बनाए नियमो, परपराओ तथा मूल्यों को धारण करने सम्बन्धी नैतिकता का विकास होता हुआ देखा जा सकता है | इस अवस्था में उसे अच्छाई-बुराई का ज्ञान हो जाता है और वह यह समझने लगता है की उसके किस प्रकार के आचरण या व्यवहार से दूसरो का अहित होगा या ठेस पहुंचेगी |
आधारहीन आत्म्चेत्नावस्था :- यह अवस्था किशोरावस्था से जुडी हुई है | इस अवस्था में बालको का समाजिक, शारीरिक तथा मानसिक विकास अपनी ऊँचाइयों को छूने लगता है और उसमे आत्म चेतना का प्रादुर्भाव हो जाता है | यह मेरा आचरण है, मै ऐसा व्यवहार करता हूँ, इसकी उसे अनुभूति होने लगती है तथा अपने व्यवहार आचरण और व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों की स्वयं ही आलोचना करने की प्रवृत्ति उसमे पनपने लगती है | पूर्णता की चाह उसमे स्वयं से असंतुष्ट रहने का मार्ग प्रशस्त कर देती है | यही असंतुष्टि उसे समाज तथा परिवेश में जो कुछ गलत हो रहा है, उसे बदल डालने या परम्पराओ के प्रति विद्रोही रुख
अपनाने को उकसाती है |
आधारयुक्त आत्मचेत्नावस्था :- नैतिक या चरित्रिक विकास की यह चरम अवस्था है | भली-भांति परिपक्वता ग्रहण करने के बाद ही इस प्रकार का विकास सम्भव है | अब यहाँ जिस प्रकार के नैतिक आचरण और चरित्रिक मूल्यों की बात व्यक्ति विशेष में की जाती है उसके पीछे केवल उसकी भावनाओ का प्रवाह मात्र ही नही होता बल्कि वह अपनी मानसिक शक्तियों का उचित प्रयोग करता हुआ अच्छी तरह सोच समझकर किसी व्यवहार या आचरण विशेष को अपने व्यक्तित्व गुणों में धारण करता हुआ पाया जाता है |
व्यगोटस्की के सामाजिक विकास का सिद्धान्त (CTET UPTET Online Practice Paper Study Material 2018 in Hindi Download
सोवियत रूस के मनोवैज्ञानिक लेव व्यगोटस्की ने बालको में सामाजिक विकास से सम्बन्धित एक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया | इस सिद्धान्त में उन्होंने बताया की बालक के प्रत्येक विकास में उसके समाज का विशेष योगदान होता है | उन्होंने बतया की समाज से अन्त:क्रिया के फलस्वरूप ही उसमे विभिन्न प्रकार का विकास होता है | समाज में उसे जिस प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध होगी, उसका विकास भी उसी प्रकार का होगा | यदि उसे सभी प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध नही होगी, तो इसका उसके विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा | जन्म के समय शिशु का व्यवहार सामाजिकता से काफी दूर होता है | वह अत्यधिक स्वार्थी होता है | उसे केवल अपनी शारीरिक आवश्यकताओ की पूर्ति करने की ललक होती है तथा दूसरो के हित चिन्तन की वह कुछ भी प्रवाह नही करता |
वह इस आयु में गुड्डे-गुडियों, खिलौने, मूर्ति, आदि निर्जीव पदार्थो तथा पशु-पक्षी, मनुष्य आदि सजीव प्राणियों में कोई अन्तर नही समझ पाता | शिशुओ के सामाजिक विकास के द्रष्टिकोण से उनसे बहुत आशा नही की जा सकती | बाल्यावस्था में प्रवेश करने के साथ-साथ अधिकांश बच्चे विधालय में जाना प्रारम्भ कर देता है और अब उनका सामाजिक दायरा बहुत विस्तृत बनता चला जाता है | बाल्यावस्था के बाद किशोरावस्था में लिंग सम्बन्धी चेतना तीव्र हो जाती है | इस आयु में अधिकतर किशोर और किशोरियाँ अपने व्यस्क-समूह के सक्रिय सदस्य होते है | समूह के प्रति उत्पन्न भावना अब केवल टोली या गिरोह विशेष तक ही सिमिंत नही रहती बल्कि यह विधालय, समुदाय प्रान्त और राष्ट्र तक व्यापक बन जाती है | सहानुभूति, सहयोग, सदभावना, परोपकार और त्याग का अदभुत सामंजस्य इस अवस्था में देखने को मिलता है | किशोरावस्था संवेगों की तीव्र अभिव्यक्ति की अवस्था भी है | इस अवस्था में विशिष्ट रुचियों और सामाजिक सम्पर्क का क्षेत्र भी अत्यधिक विस्तृत होता है | वैयक्तिक विशेषताओ के अतिरिक्त संस्कृति, परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति, यौन सम्बन्धी स्वतन्त्रता और जानकारी इत्यादि उनकी सामाजिक रुचियों और सामाजिक सम्बन्धो को प्रभवित करती है |
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