CTET UPTET Gender Issues Social Construct Study Material Practice Paper Hindi

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लैगिक भेद- भाव(Gender Issues Social Construct Study Material Practice Paper Hindi)

लैगिक भेद बाव के आदार पर विभिन्न दृष्टयों से जो अन्य भिन्नताएँ पाई जाती है वो निम्नवत् हैं

  1. समूह भेद जब समूह भेद या वर्ग भेद की चर्चा करते है तो हम समूह के गुण लक्षण आदि के भेदों की बात भी कहते है। इन समूहों का आधार कोई भी हो सकता है यथा लिंग, अवस्था, जाति, सामाजिक –अर्थिक स्तर तथा व्यक्तित्व आप इन समूह के भेदों को जानने में रुचि लेगे। इस समुह भेद की जानकारी से आपको दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने में सहायता मिलती है।

समानता आरज के समय मी मुख्य माँग है। इस समानता का सन्दर्भ समान शेक्षि क योग्यता  समान कुशलता , समान क्षमता सामन अधिकार, पढाई तथा कार्य का समान क्षनता, सान अधिकार पढाई दूसरों शब्दों में हम स्त्री पुरुष के वर्ग या समूह के आधार पर किसी प्राकर के भेद को मान्यता नही देते है। लिगभेद का सिद्धान्त भेद पर ही आधारित है, अर्थात स्त्री तथा पुरुष में कुछ भेद पाए जाते है भले ही हम कहै कि इनके बीच सामाजिक तथा शैक्षिक आधार पर कोई भैद नहीं है। इस भेद से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है- क्या महिलाएँ  शारीरिक लक्षण कौशल, जीवन मूल्य, दक्षता के आधार पर पुरुषों से कुछ भिन्न है या नहीं? यदि इस आधार पर उनमें कोई भिन्नता नही पाई जाती है तो इस तथ्य की खोज करनी होगी कि फिर क्यों उनके साथ कुछ क्षेत्रों में भेद – भाव किया जाता है।

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  1. जाति के सन्दर्भ में लैंगिक मुददे विभिन्न जातियों के समूह पर किए गए अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि उच्च –बौद्धिक मान्यता के क्षेत्रों यथा –तर्क, अवधान आदिम जाति के लोगों में संवेदी तथा चालक अभिलक्षण संवेदी अनुक्रिया में सूक्षमता तथा प्रत्यक्षण की सूक्षमता काफी अधिक थी। इस प्रकार के अनुसंधानों के तथ्यों से यह आभास मिलता है कि जातियों के बौद्धिक स्तर भेद को अधिक तूल नही दिया जा सकता है। अमिश्रित जातियों पर मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना बड़ा जटिल कार्य है। जब हम एक ही देश में रहने वाली हो जातियों का अध्ययन करते है तो उनका वर्गीकरण कर पाना कठिन होता है ऐसा करते समय इनके सांस्कृतिक तथा सामाजिक प्रभाव का सम्मिश्रण इतना अधिक हो जाता है कि जातीय या नृवंश सम्बन्धी के समूह भेद के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए साधन उपलब्ध नही है ऐसी परिस्थिति में जन्मजात गुणों तथा वातावरम जनित प्रभावों को पृथक् करना भी कठिन है। किसी क्षेत्र विशेष का भौगोलिक वातावरण। जलवायु, रहन- सहन का ढंग, सास्कृतिक वातावरण, व्यक्ति के लम्बे जीवन को इतना अधिक प्रभावित करता है कि उसके प्रभाव की अलग से जाँच करना सरल कार्य नहीं है। दरअसल मानसिक विकास का स्तर और क्रम बातावरण के प्रभाव तथा व्यक्ति की व्यक्तिगत योग्यताओं के आदन प्रदान की विचित्र प्रक्रिया है।
  2. आयु की दृष्टि से भिन्नताएँ आयु एक महत्वपूर्ण कारक होता है जो व्यक्तिगत भिन्नता को प्रभावित करता है। आयु की वृद्धि के साथ बालक बालिकाओ दोनों में भिन्नताएँ उत्पन्न होने लगती है। उम्र बढ़ने के साथ वातावरम में समंजन के लिए व्यक्ति में योग्यता उत्पन होती है। आयु वृद्धि के साथ वक्ति विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए योग्यताएँ विकसित करता है। एक बालक जब शिशु से पिरपक्व होता है तो उसकी मानसिक शक्ति बढ़ जाती है। उका शरीर, तान्त्रिका, तन्त्र, मस्तिष्क और इसके कार्य परिपक्व हो जाते है और उसकी माननसिक शक्ति ने अपेक्षाकृत व्कास हो जाता है। इससे अनुभवों की भी वृद्धि होती है और बालक- बालिकाओं की मानसिक शक्ति में अपेक्षाकृत विकास हो जाता है इससे अनुभवो की भी वृद्धि होती है और बालक –बालिकाओं की मानसिक क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार स्पष्ट हे कि व्यक्तिगत भिन्नता लाने में उम्र भी महत्वपूर्ण कारक के रुप में कार्य करती है। ये भिन्नताएँ किशोरावस्था की अपेक्षा बाल्यावस्था में अधिक दिखाई देती है।

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आयु की दृष्टि से भिन्नताओं से सम्बन्धित सिद्धान्तों की स्थापना के लिए इसका वैज्ञानिक अध्ययन की योजना बनानी जरुरी है कुछ क्षेत्र में इस सम्बन्ध में अध्ययन किया गया है और इसके अच्छे परिणाम आए हैं। बालक मानसिक विकास की दृष्टि से भिन्न होते है। यहाँ तक कि एक ही बालक में विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न गतियों से मानसिक विकासहोता है वृद्धि कुछ अवअधियों मे तेज होती है जबकि अन्य अवधियों में धीमी होती है. कुछ मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि वृद्धि विशिष्ट आयु 15-16 वर्ष में रुक जाती है। जबकि अन्य का विचार हे कि बुद्धि का विकास 20 या 25 वर्ष की अवस्था में बन्द हो जाता है। शोध से ज्ञात होता है कि मानसिक क्षमताओंके अधिक उपयोग से इसमें वृद्धि होती है। अनेक वृद्धि व्यक्ति पढने में अधिक रुचि लेने लगते है। अनेक वृद्ध व्यक्ति पढ़ने में अधिक रुचि लेलने लगते है। इसलिए इस बातर पर जोर दिया जाता है कि अधिगम जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। इस विचार का उपयोग विभिन्न कार्यक्रमों में किया जाता है।

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  1. सामाजिक –आर्थिक स्तर की दृष्टि से भिन्नताएँ अनेक अध्ययनों से पता चलता हैकि विभिन्न सामाजिक – आर्थिक स्तरों से सम्बन्धित व्यक्तियों की औसत योग्यता , उपलब्धि और अभिरिचि में भिन्नताएं मिलती है प्राय: देखा गया है कि कम औसत योग्यता वाले बालक प्राय: खराब मामाजिक आर्थिक स्तर वाले लोगों के होते है निम्न स्तर में उच्च आर्थिक स्तर के बच्चे कम होते है जब आर्थिक स्तर को मापा जाता है तो इसे बद्धि से सम्बद्ध किया जा सकात है इन दोनों के बीच सह सम्बन्ध 0.30 आता है। अनेक अध्ययनों से देखा जा सकताहै, विभिन्न श्रेणियों के बच्चों के लिए परीक्षणों में बुद्धि की भिन्नता स्पष्ट रुप से दिखाई देती है। अन्य अध्ययनों से सामाजिक स्तर और बुद्धि में अजीब सम्बन्ध होता है। प्राय: लोगों को कहते सुना जाता है कि गरीब लोग गरीब है, क्योकि वे गरीब है । वस्तुत:इस प्राकर की भिन्नताएँ आनुवंशिकता के कारण भी होती है। परन्तु अनेक मनोवैज्ञानिक इस तर्क से सहमत नही है। इसमें एक विचारधारा के लोगों का कहना है कि विद्दमान बुद्धि परीक्षण निम्न वर्ग के बच्चों के क्षमतों का मापन नही करते है। इसलिए इस वर्ग के बच्चों की भिन्नताएँ उच्च वर्ग के बच्चों की भिन्नताओंसे अलग हो जाती है। इसलिए इस क्षेत्र में अधिक परीक्षणों की आवशयकता है। दूसरी विचारधारा के लोगों का विचार सामान्य बुद्धिपरक विकास के अनुभवों पर आधारित है। विद्दालय जाने वाले बालक विकास की अवस्था में होते है। सांस्कृति विचलन इन बच्चों में भिन्नताएँ उत्पन्न करता है जो अधिक उम्र के होते है। ये अन्तर शैक्षणिक और अधिगम प्रबन्धों के कारण होते है। इसलिए शिक्षक ऐसा वातावरण उत्पन्न कर सकता है जिससे छात्रों पर सामाजिक –आर्थिक स्तर का प्रभाव न पडे और उसका शेक्षणक विकास होता रहै। छात्रों की संवेगात्मक समस्याएँ भी सामाजिक –आर्थिक स्तर को प्रभावित करती है।

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